Edited By jyoti choudhary,Updated: 04 Jul, 2026 01:46 PM

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट आने के संकेत मिल रहे हैं। मॉर्गन स्टैनली और गोल्डमैन सैक्स के बाद अब दिग्गज अमेरिकी निवेश बैंक सिटीग्रुप (Citigroup) ने भी अनुमान जताया है कि साल के अंत तक कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 60
बिजनेस डेस्कः वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट आने के संकेत मिल रहे हैं। मॉर्गन स्टैनली और गोल्डमैन सैक्स के बाद अब दिग्गज अमेरिकी निवेश बैंक सिटीग्रुप (Citigroup) ने भी अनुमान जताया है कि साल के अंत तक कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को राहत मिलेगी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती की संभावना बढ़ सकती है।
सिटी ने अपनी रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी के अंत में शुरू हुए अमेरिका-ईरान संघर्ष के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य पर दोहरी नाकेबंदी जैसी स्थिति बन गई थी। इस वजह से कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई थी। हालांकि, दोनों देशों के बीच अंतरिम समझौते के बाद हालात सामान्य होने लगे हैं और इस अहम समुद्री मार्ग पर तेल आपूर्ति फिर से सुचारु हो गई है। पर्याप्त आपूर्ति के चलते दूसरी तिमाही में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 30 प्रतिशत गिरकर लगभग 71.92 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई है।
विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक तेल बाजार तेजी से संतुलन की ओर लौट रहा है। होर्मुज मार्ग खुलने से रिफाइनरियों को पर्याप्त कच्चा तेल मिल रहा है। वहीं, दुनिया के सबसे बड़े आयातक चीन की मांग फिलहाल कमजोर बनी हुई है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल की खपत का दबाव कम है। इसके अलावा, तेल भंडार में अपेक्षा से कम गिरावट दर्ज होने से यह संकेत मिलता है कि बाजार में आपूर्ति पर्याप्त बनी हुई है।
$60-65 के दायरे में आएगा ब्रेंट क्रूड
सिटी का कहना है कि गर्मियों के दौरान यदि कीमतों में अस्थायी तेजी आती भी है तो वह ज्यादा समय तक टिकने वाली नहीं होगी। बैंक का अनुमान है कि साल के अंत तक ब्रेंट क्रूड 60-65 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में पहुंच सकता है। इससे पहले गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टैनली भी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का अनुमान जता चुके हैं।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें घटने से सरकारी तेल विपणन कंपनियों की लागत कम होगी, उनका मुनाफा बढ़ सकता है और उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना भी बढ़ जाएगी।