Edited By jyoti choudhary,Updated: 16 Feb, 2026 12:59 PM

साल 2025 में रिकॉर्डतोड़ तेजी दिखाने के बाद अब सोने की चमक फीकी पड़ती नजर आ रही है। जनवरी 2026 में MCX पर ऐतिहासिक ऊंचाई छूने वाला सोना अब तेज गिरावट के दौर में है। रिकॉर्ड स्तर से कीमतों में बड़ी कटौती हो चुकी है और बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है।...
बिजनेस डेस्कः साल 2025 में रिकॉर्डतोड़ तेजी दिखाने के बाद अब सोने की चमक फीकी पड़ती नजर आ रही है। जनवरी 2026 में MCX पर ऐतिहासिक ऊंचाई छूने वाला सोना अब तेज गिरावट के दौर में है। रिकॉर्ड स्तर से कीमतों में बड़ी कटौती हो चुकी है और बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट अभी थमी नहीं है। वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती, केंद्रीय बैंकों की रणनीति में बदलाव और मुनाफावसूली के दबाव के बीच कुछ एनालिस्ट्स ने आशंका जताई है कि भारत में सोने का भाव ₹1 लाख प्रति 10 ग्राम से भी नीचे जा सकता है।
पिछले शुक्रवार को सोना अपने रिकॉर्ड स्तर से करीब ₹24,500 यानी 13.5% टूटकर ₹1,56,200 पर आ गया। सोमवार, 16 फरवरी को भी MCX पर सोना 0.61% गिरकर करीब ₹1,54,937 प्रति 10 ग्राम पर कारोबार करता नजर आया।
रूस का डॉलर की ओर झुकाव बना बड़ी वजह
बुलियन बाजार के जानकारों के मुताबिक सोने में आई इस तेज गिरावट के पीछे रूस के डॉलर को लेकर बदले रुख की अहम भूमिका है। एक रिपोर्ट के अनुसार रूस एक बार फिर अमेरिका के साथ अमेरिकी डॉलर (USD) में व्यापार की संभावनाएं तलाश रहा है। यह खबर इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि रूस लंबे समय से ‘डी-डॉलराइजेशन’ की अगुवाई करता रहा है।
अगर रूस फिर से डॉलर आधारित व्यापार की ओर बढ़ता है, तो BRICS देशों के उस सपने को झटका लग सकता है, जिसमें सोने को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विकल्प बनाने की बात कही जा रही थी। फिलहाल मॉस्को की ओर से इस रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक खंडन नहीं आया है, जिससे बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।
डी-डॉलराइजेशन पर सवाल
ब्रिक्स देशों—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका—ने बीते कुछ वर्षों में आक्रामक तरीके से सोने की खरीदारी की थी। इन देशों का मकसद डॉलर की निर्भरता कम करना और सोने को व्यापार का आधार बनाना था। आंकड़ों के मुताबिक ब्रिक्स देश वैश्विक स्वर्ण उत्पादन का करीब 50% हिस्सा नियंत्रित करते हैं।
SEBI-पंजीकृत बाजार विशेषज्ञ अनुज गुप्ता के अनुसार, जब से Donald Trump व्हाइट हाउस लौटे, वैश्विक स्तर पर टैरिफ और व्यापार नीतियों की आशंका बढ़ी। इसी वजह से केंद्रीय बैंकों ने सोने की खरीद तेज कर दी, जिससे कीमतों में असामान्य उछाल आया। हालांकि अब रूस का रुख बदलना डी-डॉलराइजेशन की पूरी रणनीति को कमजोर कर सकता है।
क्या ₹1 लाख से नीचे जाएगा सोना?
बाजार में कुछ अनुमान और भी ज्यादा चौंकाने वाले हैं। PACE 360 के अमित गोयल का कहना है कि सोना अपना शिखर बना चुका है और गिरावट अभी खत्म नहीं हुई है। उनके मुताबिक भारत में सोना पहले ही करीब 15% टूट चुका है और आगे चलकर ₹1 लाख प्रति 10 ग्राम से नीचे भी जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के $3,000 प्रति औंस तक फिसलने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहले ‘पेपर गोल्ड’ यानी डिजिटल निवेश में बिकवाली बढ़ेगी, उसके बाद भौतिक सोने की कीमतें भी दबाव में आएंगी। मौजूदा हालात में सोने में आने वाली किसी भी छोटी तेजी को “डेड कैट बाउंस” माना जा रहा है यानी बड़ी गिरावट से पहले की अस्थायी उछाल।
कुल मिलाकर, रूस के डॉलर की ओर संभावित झुकाव ने ग्लोबल गोल्ड मार्केट की दिशा बदल दी है और निवेशकों के सामने अब बड़ा सवाल यही है—क्या सोने की चमक वाकई फीकी पड़ने वाली है?