महिलाओं के लिए सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार हों शहरों के विकास की योजनाएं

Edited By Updated: 18 Sep, 2026 11:38 AM

build cities for women

शहरों की योजना और बुनियादी ढांचे का विकास महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखकर शुरुआत से ही किया जाना चाहिए। सुरक्षा को बाद में जोड़े जाने वाली व्यवस्था मानने की बजाय इसे शहरी विकास का अभिन्न हिस्सा बनाने की जरूरत है। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय...

नई दिल्ली (इंट): शहरों की योजना और बुनियादी ढांचे का विकास महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखकर शुरुआत से ही किया जाना चाहिए। सुरक्षा को बाद में जोड़े जाने वाली व्यवस्था मानने की बजाय इसे शहरी विकास का अभिन्न हिस्सा बनाने की जरूरत है। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय परामर्श में विशेषज्ञों ने कहा कि महिला सुरक्षा का मतलब केवल हिंसा की घटनाओं को कम करना नहीं, बल्कि ऐसा शहर बनाना है जहां महिलाएं बिना डर के आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में भाग ले सकें।

सुरक्षा से आगे बढ़कर समान अधिकार
संयुक्त राष्ट्र की भारत में रैजीडैंट को-ऑर्डिनेटर स्टीफन प्रीस्नर ने कहा कि लक्ष्य केवल ऐसे स्थान बनाना नहीं होना चाहिए जहां हिंसा की घटनाएं कम हों, बल्कि ऐसे शहर होने चाहिएं जहां महिलाओं को अपने दैनिक जीवन की योजना बनाने और फैसले लेने की वास्तविक स्वतंत्रता मिले। संयुक्त राष्ट्र महिला भारत की ओर से आयोजित ‘सुरक्षित और समावेशी सार्वजनिक स्थान’ विषयक परामर्श में शोधकर्त्ताओं, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं, सरकारी अधिकारियों और शहरी योजनाकारों ने हिस्सा लिया।

आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी है सुरक्षा
नीति आयोग के वरिष्ठ सलाहकार एवं कार्यक्रम निदेशक राजीब कुमार सेन ने कहा कि महिला सुरक्षा को महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी से भी जोड़कर देखना चाहिए। उनके अनुसार महिला नेतृत्व वाले विकास के दौर में शहरों की योजना को अधिक समावेशी बनाने का अवसर है, जिससे महिलाओं को शहरों तक सार्थक पहुंच मिल सके।

सड़क से आखिरी छोर तक सुरक्षा
बैठक में राज्यवार आंकड़े जुटाने, पर्यटन शहरों को सुरक्षित बनाने, सार्वजनिक स्थानों से जुड़े कर्मचारियों में लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने और सार्वजनिक स्थानों की परिभाषा को व्यापक करने पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने अंतिम छोर तक की यातायात सुविधा में सुरक्षा को प्राथमिकता देने और केंद्र तथा राज्यों के बजट में लैंगिक दृष्टिकोण शामिल करने की जरूरत भी बताई।

‘महिलाएं शहर की उपयोगकर्त्ता नहीं थीं’ वाली सोच बदले
दिल्ली के सुरक्षित शहर कार्यक्रम से जुड़े रहे विशेषज्ञों ने कहा कि लंबे समय तक शहरों की योजना इस तरह बनाई गई जैसे महिलाएं उनकी प्रमुख उपयोगकर्त्ता ही नहीं हों। जैंडर सलाहकार और महिला अधिकार संगठन जागोरी की बोर्ड सदस्य सुनीता कर धर ने कहा कि अब सोच सुरक्षा देने से आगे बढ़कर शहर पर सभी के समान अधिकार की ओर जा रही है।

निर्भया कांड के बाद बदली कार्यशैली
अरुणाचल पुलिस में उप महानिरीक्षक और दिल्ली की पूर्व पुलिस उपायुक्त सुमन नालवा ने 2012 के निर्भया कांड के बाद विभिन्न विभागों के साथ मिलकर किए गए काम को याद किया। उन्होंने बताया कि रोजाना खराब स्ट्रीट लाइट की शिकायतें आती थीं और उन्हें रात तक ठीक कराया जाता था। उनके अनुसार संस्थानों में ऐसी संवेदनशीलता और तुरंत कार्रवाई की जरूरत है, जिसके लिए बाहरी दबाव का इंतजार न करना पड़े।

36 देशों के 75 शहरों तक पहुंची पहल
संयुक्त राष्ट्र महिला की सुरक्षित शहर और सुरक्षित सार्वजनिक स्थान पहल के 15 वर्ष पूरे हो चुके हैं। नई दिल्ली इसके पांच संस्थापक शहरों में शामिल थी। अब यह पहल 36 देशों के 75 शहरों तक पहुंच चुकी है।

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