Edited By Niyati Bhandari,Updated: 15 Aug, 2026 10:35 AM
Hariyali Teej 2026: हिंदू धर्म में हरियाली तीज का विशेष महत्व है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन से है। स्वयं महादेव...
Hariyali Teej 2026: हिंदू धर्म में हरियाली तीज का विशेष महत्व है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन से है। स्वयं महादेव ने माता पार्वती को उनके पिछले जन्म की याद दिलाने के लिए इस पावन व्रत की कथा सुनाई थी।
Hariyali Teej Vrat Katha 2026: हिंदू धर्म में हरियाली तीज का पावन पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए आस्था और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। सावन के महीने में जब प्रकृति चारों ओर हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब महिलाएं अपने सुहाग की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन का सीधा संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन से है।

Hariyali teej vrat katha: पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पिछले जन्म की याद दिलवाई कि किस तरह तुमने बाल्यावस्था में घोर तप किया था। तुमने उस तपस्या में अन्न, जल का त्याग कर दिया था। तुम्हारे पिता तुम्हारी इस तपस्या को देखकर बहुत निराश हो गए थे। फिर एक दिन नारद जी तुम्हारे घर आए। तुम्हारे पिता ने उनके आने का कारण पूछा फिर नारद जी ने बताया कि मैं भगवान विष्णु जी के कहने पर यहां आया हूं।
भगवान विष्णु आपकी कन्या की तपस्या से प्रसन्न होकर उससे विवाह करना चाहते हैं। तुम्हारे पिता तुम्हारे विवाह के लिए खुशी-खुशी मान गये। फिर नारद जी तुम्हारे पिता से आज्ञा लेकर वहां से चले गए परंतु जब तुम्हें अपने विवाह का समाचार मिला तब तुम बहुत निराश हो गई।
फिर तुम्हारी सहेली ने तुम से तुम्हारे दुख का कारण पूछा तब तुमने उसे बताया कि मैं सच्चे मन से भगवान शिव का वरण कर चुकी हूं। भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती हूं। मेरे पास प्राण त्यागने के अतिरिक्त अब कोई ओर रास्ता नहीं है। फिर तुम्हारी सखी ने तुम्हे बताया कि जिस को भी मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया हो तब जीवन भर उसी के साथ रहना चाहिए। तुम्हे भगवान शिव के प्रति सच्ची आस्था रखनी चाहिए। तुम्हारी सहेली तुम्हें वन में लेकर चली गई।
उधर तुम्हारे पिता तुम्हे घर में न पाकर बड़े दुःखी हुए उन्होंने तुम्हारी खोज शुरू करवा दी। मगर तुम अपनी तपस्या में लीन रही। तुम्हारी इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मैंने तुमसे वर मांगने को कहा तब तुमने मुझे कहा कि ‘मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूं, मैं आपकी अर्धांगिनी बनना चाहती हूं। मैं तुम्हें मनवांछित वर देकर वहां से चला गया।
तब तुम्हारे पिता तुम्हारी खोज करते वहां तक आ पहुंचे। उन्होंने तुम से घर जाने को कहां, फिर तुमने उन्हें अपनी तपस्या के बारे में बताते हुए कहां कि तुम भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हो। आप मेरा विवाह विष्णु जी से करने का निश्चय कर चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर से चली गई थी। फिर तुम्हारे पिता ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार कर ली और कुछ समय के पश्चात पूरे विधि–विधान के साथ हमारा विवाह हुआ।

जब रेत के शिवलिंग से प्रसन्न हुए महादेव
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती ने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया था। बचपन से ही उनके मन में भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम था और वे उन्हें ही पति के रूप में पाना चाहती थीं।
जब माता पार्वती विवाह योग्य हुईं, तो देवर्षि नारद ने उनके पिता हिमालय को भगवान विष्णु के साथ विवाह का सुझाव दिया, जिस पर हिमालय राज तुरंत सहमत हो गए। पिता के इस निर्णय से माता पार्वती व्याकुल हो गईं। शिव को पाने के दृढ़ संकल्प के साथ वे एकांत जंगल में चली गईं और वहां कठोर तपस्या शुरू कर दी।
कहा जाता है कि माता पार्वती ने रेत से एक शिवलिंग का निर्माण किया और निराहार रहकर शिव की आराधना की। उनकी इस निस्वार्थ भक्ति और कठिन तप से महादेव का सिंहासन हिल गया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और उनकी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया। अंततः पर्वतराज हिमालय ने भी शिव जी को अपने दामाद के रूप में सहर्ष स्वीकार कर लिया।

हरियाली तीज कथा का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, प्रेम और धैर्य से भगवान को पाया जा सकता है। देवी पार्वती ने जिस दृढ़ निष्ठा और संकल्प से शिव को पाया, वही आदर्श आज भी नारी शक्ति के लिए प्रेरणा है।
हरियाली तीज कथा के बाद व्रती यह प्रार्थना करें
"हे गौरी मां! जैसे आपने शिवजी को पाया, वैसे ही हम सब पर भी कृपा करें। हमारे वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौभाग्य और समृद्धि बनी रहे।"
भाद्रपद कि शुक्ल तृतीया को तुमने जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका। इस व्रत को जो भी सच्ची निष्ठा से करेगा उसे मन वांछित फल की प्राप्ति होगी। कुंवारी महिलाओं को मनभावन जीवनसाथी मिलेगा और विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहेगा।
