Edited By Niyati Bhandari,Updated: 25 Aug, 2026 01:20 PM
Hayagriva Jayanti 2026 katha: हयग्रीव जयंती पर जानिए भगवान विष्णु के अनोखे घोड़े के सिर वाले अवतार की कथा। कैसे देवी महामाया के वरदान और एक कीड़े की वजह से श्रीहरि को लेना पड़ा यह अवतार। पढ़ें पूरी पौराणिक और शास्त्रीय कथा।
Hayagriva Jayanti 2026 katha: सनातन धर्म में श्रावण मास की पूर्णिमा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इसी पावन तिथि को हयग्रीव जयंती का अत्यंत पवित्र और दुर्लभ पर्व मनाया जाता है। यह तिथि विद्या, बुद्धि, विवेक और उत्तम ज्ञान की प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। हयग्रीव अवतार में भगवान विष्णु का स्वरूप अत्यंत अनोखा और दिव्य है। संस्कृत में 'हय' शब्द का अर्थ घोड़ा और 'ग्रीव' का अर्थ गर्दन होता है। इस अलौकिक अवतार में भगवान का मुख अश्व के समान है, जबकि उनका धड़ तेजस्वी मनुष्य के समान है। इन्हें वेदों के रक्षक और ज्ञान के आदि-स्रोत के रूप में पूजा जाता है। आइए जानते हैं भगवान विष्णु के इस दिव्य अश्वमुख अवतार की दो सबसे प्रमुख और अद्भुत कथाएं, जो हमें जीवन में ज्ञान और सत्य की रक्षा का संदेश देती हैं।
प्रथम कथा: पाताल लोक से वेदों की पुनर्प्राप्ति (मधु-कैटभ वध)
पुराणों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में मधु और कैटभ नामक दो दैत्य ब्रह्मा जी के कान से उत्पन्न हुए। उन्होंने वेदों की चोरी कर उन्हें पाताल लोक में छिपा दिया। ब्रह्मा जी चिंतित हुए और भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की।
भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण किया। जिसमें उनका मुख घोड़े के समान था और वे पाताल लोक में गए। वहां उन्होंने युद्ध कर मधु और कैटभ का वध किया और वेदों को पुनः प्राप्त कर ब्रह्मा जी को लौटाया, जिससे सृष्टि का क्रम फिर से व्यवस्थित हुआ। इसलिए हयग्रीव को वेदमूर्ति, ज्ञानस्वरूप और शब्दब्रह्म भी कहा जाता है।

द्वितीय शास्त्रीय कथा: असुर हयग्रीव का वरदान और श्रीहरि का कटा मस्तक
एक समय की बात है। हयग्रीव नाम का एक परम पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने सरस्वती नदी के तट पर जाकर भगवती महामाया की प्रसन्नता के लिए बड़ी कठोर तपस्या की। वह बहुत दिनों तक बिना कुछ खाए भगवती के मायाबीज एकाक्षर महामंत्र का जाप करता रहा। उसकी इंद्रियां उसके वश में हो चुकी थीं। सभी भोगों का उसने त्याग कर दिया था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया। भगवती महामाया ने उससे कहा, ‘‘महाभाग! तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुम पर परम प्रसन्न हूं। तुम्हारी जो भी इच्छा हो मैं उसे पूर्ण करने के लिए तैयार हूं। वत्स! वर मांगो।’’
भगवती की दया और प्रेम से ओत-प्रोत वाणी सुनकर हयग्रीव की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसके नेत्र आनंद के अश्रुओं से भर गए। उसने भगवती की स्तुति करते हुए कहा, ‘‘कल्याणमयी देवि! आपको नमस्कार है। आप महामाया हैं। सृष्टि, स्थिति और संहार करना आपका स्वाभाविक गुण है। आपकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे अमर होने का वरदान देने की कृपा करें।’’
देवी ने कहा, ‘‘दैत्य राज! संसार में जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। प्रकृति के इस विधान से कोई नहीं बच सकता। किसी का सदा के लिए अमर होना असंभव है। अमर देवताओं को भी पुण्य समाप्त होने पर मृत्यु लोक में जाना पड़ता है। अत: तुम अमरत्व के अतिरिक्त कोई और वर मांगो।’’
हयग्रीव बोला, ‘‘अच्छा तो हयग्रीव के हाथों ही मेरी मृत्यु हो। दूसरे मुझे न मार सकें। मेरे मन की यही अभिलाषा है। आप उसे पूर्ण करने की कृपा करें।’’

‘ऐसा ही हो’। यह कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गईं। हयग्रीव असीम आनंद का अनुभव करते हुए अपने घर चला गया। वह दुष्ट देवी के वर के प्रभाव से अजेय हो गया। त्रिलोकी में कोई भी ऐसा नहीं था, जो उस दुष्ट को मार सके। उसने ब्रह्मा जी से वेदों को छीन लिया और देवताओं तथा मुनियों को सताने लगा। यज्ञादि कर्म बंद हो गए और सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ने लगी। ब्रह्मादि देवता भगवान विष्णु के पास गए, किन्तु वे योगनिद्रा में निमग्र थे। उनके धनुष की डोरी चढ़ी हुई थी। ब्रह्मा जी ने उनको जगाने के लिए वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया।
ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उसने धनुष की प्रत्यंचा काट दी। उस समय बड़ा भयंकर शब्द हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिर रहित भगवान के धड़ को देखकर देवताओं के दुख की सीमा न रही। सभी लोगों ने इस विचित्र घटना को देखकर भगवती की स्तुति की। भगवती प्रकट हुई। उन्होंने कहा, ‘‘देवताओ चिंता मत करो। मेरी कृपा से तुम्हारा मंगल ही होगा। ब्रह्मा जी एक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का हयग्रीवावतार होगा। वे उसी रूप में दुष्ट हयग्रीव दैत्य का वध करेंगे।’’
ऐसा कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गई।
भगवती के कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्मा जी ने एक घोड़े का मस्तक उतारकर भगवान के धड़ से जोड़ दिया। भगवती के कृपा प्रसाद से उसी क्षण भगवान विष्णु का हयग्रीव अवतार हो गया। फिर भगवान का हयग्रीव दैत्य से भयानक युद्ध हुआ। अंत में भगवान के हाथों हयग्रीव की मृत्यु हुई। हयग्रीव को मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्मा जी को पुन: समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियों का संकट निवारण किया।
