Edited By Niyati Bhandari,Updated: 02 Sep, 2026 12:04 PM

Janmashtami Vrat Niyam: श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत अन्य उपवासों से काफी अलग और कठिन माना जाता है। जानिए, जन्माष्टमी व्रत के वो जरूरी नियम, पूजा विधि और पारण का सही समय ताकि आपकी पूजा पूर्ण और फलदायी हो सके।
Janmashtami Vrat Niyam: श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व भगवान श्री कृष्ण के बाल गोपाल रूप के अवतरण दिवस के रूप में बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। साल 2026 में जन्माष्टमी का व्रत 4 सितंबर को रखा जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्री कृष्ण का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, इसलिए इस दिन उनके बाल रूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर कान्हा को प्रसन्न करते हैं, लेकिन आपको बता दें कि जन्माष्टमी का व्रत अन्य साधारण उपवासों से काफी अलग है। इसे रखने के कुछ विशेष और कड़े नियम हैं, जिनका पालन करना हर व्रती के लिए अनिवार्य होता है। अगर इन नियमों में कोई चूक हो जाए, तो व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है।

आइए जानते हैं शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी व्रत के वे महत्वपूर्ण नियम और सही पूजा विधि, जिनके बिना आपका व्रत अधूरा रह सकता है:
जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले व्रती को एक दिन पहले ही व्रत का पालन करना अनिवार्य होता है। ये व्रत एक दिन पूर्व रात 12 बजे के बाद से ही शुरू हो जाता है और अगले दिन रात 12 बजे श्रीकृष्ण के जन्म के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। जन्माष्टमी का व्रत रखने से एक दिन पहले भी सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और श्रीकृष्ण के आगे व्रत का संकल्प करें। यह संकल्प आप हाथों में तुलसी की एक पत्ती पकड़ कर करें और साथ ही व्रत के दौरान होने वाली किसी भी भूल के लिए पहले ही क्षमा मांग लें।
अगर आप विवाहित हैं तो उपवास रखने के एक रात्रि पूर्व आपको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। खासतौर पर रात्रि 12 बजे के बाद से ही आपका उपवास प्रारंभ हो जाता है और यह अगले दिन रात में 12 बजे ही श्री कृष्ण के जन्म के बाद ही खुलता है।
इस दिन लड्डू गोपाल को पंचामृत के साथ स्नान कराकर उसको प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए।
जन्माष्टमी के दिन श्री विष्णु की पूजा करें। उन्हें तिल अर्पित करें। व्रत के दिन मध्याहन के समय तिल के पानी से स्नान करें।
श्री कृष्ण को 56 भोग अर्पित किए जाने का विधान है। आपकी सामर्थ्य न हो तो फल, दही और दूध का भोग चढ़ाएं। इस दिन पानी में तुलसी की पत्ती डालकर सेवन करना फलदायी होता है।
श्री कृष्ण की पूजा के समय शाम को नए वस्त्र धारण करने चाहिए, अगर नए नहीं हैं तो आप जो भी धारण करें ध्यान रखें वो साफ- सुथरें हो।
जन्माष्टमी के दिन लक्ष्मी नारायण को कमल के फूलों से सजाना चाहिए। ये फूल भगवान विष्णु को बहुत प्रिय हैं। इससे घर में लक्ष्मी का वास होता है।
इस दिन जितना हो सके श्री कृष्ण के नाम का जाप करें।
शास्त्रों के अनुसार वैसे तो ये व्रत निर्जल और निराहार होता है। अगर आपके लिए ऐसा करना संभव न हो तो इस व्रत में आप फलों का सेवन कर सकते हैं। रात को 12 बजे के बाद दूध और फल ग्रहण किया जा सकता है। अगले दिन सूर्योदय होने के बाद व्रत का पारण करना चाहिए।

जन्माष्टमी पूजा और पारण का शुभ मुहूर्त
निशिता काल यानी अर्धरात्रि पूजा का समय 4 सितंबर की रात 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। भक्त इसी अंतराल में बाल गोपाल का प्राकट्य उत्सव मना सकते हैं। वहीं, व्रत का पारण अगले दिन यानी 5 सितंबर को सुबह 6 बजकर 01 मिनट के बाद किया जा सकेगा।
