विवाह की तारीख निकालने से पहले जानें क्यों जरूरी है 'शुद्ध लग्न का चयन'!

Edited By Updated: 01 Jul, 2021 03:01 PM

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हिंदू धर्म में विवाह को एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार का दर्जा प्राप्त है कहा जाता है इसके बिना हर व्यक्ति का जीवन अधूरा होता है। इसीलिए सभी माता-पिता चाहते हैं कि समय रहते ही उनकी का विवाह

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
हिंदू धर्म में विवाह को एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार का दर्जा प्राप्त है कहा जाता है इसके बिना हर व्यक्ति का जीवन अधूरा होता है। इसीलिए सभी माता-पिता चाहते हैं कि समय रहते ही उनकी का विवाह हो जाए और वह सुखी सुखी अपना जीवन व्यतीत करें। जब संतान की आयु विवाह योग्य होती है तो जीवन साथी को चुनने के बाद सबसे खास चीज़ होती है विवाह का मुहूर्त। सनातन धर्म के अनुसार विवाह एक श्रेष्ठ मुहूर्त में ही संपन्न करना चाहिए एक पवित्र संस्कार माना जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विवाह मुहूर्त के निर्धारण में कई बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है लेकिन सबसे खास होता है श्रेष्ठ मुहूर्त ताकि विवाह करने वाले को किसी भी तरह का दोष न लगे।

अतः विवाह के समय 'पाणिग्रहण'.संस्कार के लग्न का निर्धारण बड़ी ही सावधानी से किया जाता है। विवाह लगन का निर्धारण करते समय कुछ बातों एवं ग्रह स्थितियों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है आज आर्टिकल के माध्यम से हम आपको विवाह लग्न के निर्धारण से ही जुड़ी कुछ खास जानकारी प्रदान करने वाले हैं आइए जानते हैं।

पाणिग्रहण के संस्कार की लगन छुट्टी हेतु निम्न बातों का रखें ख्याल-
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विवाह लग्न का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि विवाह का लग्न वर कन्या के जन्म लग्न व जन्म राशि से अष्टम राशि का न हो।

विवाह लग्न के निर्धारण में अगर लग्न में जन्म लग्न के अष्टमेश की उपस्थिति हो तो उस लगन को त्याग देना चाहिए। कहा जाता है कि विवाह लग्न में जन्म लग्न के  में अष्टमेश का होना अशुभ होता है।

ध्यान रखें कि विवाह लग्न में लग्न भंग योग नहीं होना चाहिए। इसके अलावा विवाह लग्न से द्वादश भाव में शनि, दशम भाव में मंगल, तीसरे भाव में शुक्र, लग्न भाव में पाप ग्रह या फिर क्षीण चंद्रमा स्थित नहीं होना चाहिए इसे भी अशुभ माना जाता है

ज्योतिषी बताते हैं कि विवाह लग्नेश,चंद्र व शुक्र अशुभ अर्थात 6,8,12 भाव में भी नहीं होनाे चाहिए।
विवाह लग्न में सप्तम अष्टम भाव ग्रह नहीं तो होने चाहिए तो वहीं विवाह लग्न कर्त्तरी योग से भी ग्रसित नहीं होना चाहिए।

इन सबके अतिरिक्त बता दें जब विवाह में पानी ग्रहण हेतु शुद्ध लग्न की प्राप्ति ना हो तो गोधूलि लग्न की ग्राह्यता शास्त्र अनुसार बताई गई है। गोधूलि लग्न सूर्यास्त से 12 मिनट पूर्व एवं पश्चात कुल 24 मिनट अर्थात खड़ी होती है।हालींकिक कुछ विद्वान इसे सूर्यास्त से 24 मिनट पूर्व पश्चात कुल 48 मिनट मानते हैं।

इसके अलावा विवाह लग्न अंध, बधिर या पंगु नहीं होना चाहिए। मेष, वृषभ, सिंह, दिन में अंध, मिथुन, कर्क, कन्या रात्रि में अंध, तुला, वृश्चिक दिन में बधिर, धनु, मकर रात्रि में बधिर, कुंभ दिन में पंगु, मीन रात्रि में पंगु लग्न होती हैं किंतु ये लग्न अपने स्वामियों या गुरु से दृष्ट हों तो ग्राह्य हो जाती हैं।

अगर शास्त्र की बात की जाए तो उसमें स्पष्ट निर्देश है कि गोधूलि लग्न की ग्राह्यता केवल आपात परिस्थिति में ही होती है।।विवाह के दौरान जहां तक संभव हो शुद्ध लग्न को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। शुब फल प्राप्त होते हैं।

(नोट- तमाम दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है।) 
 

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