Shree Parshuram ji Katha : परशुराम ने क्यों उठाया था 21 बार दुष्टों के संहार का संकल्प? जानें इस पीछे की कहानी

Edited By Updated: 19 Apr, 2026 01:08 PM

shree parshuram ji katha

भृगुकुल तिलक जमदग्नि नंदन रेणुका पुत्र भगवान श्री हरि विष्णु जी के छठे अवतार समस्त शस्त्र एवं शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम का वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के दिन प्राकट्य हुआ।

Parshuram Jayanti 2026 : भृगुकुल तिलक जमदग्नि नंदन रेणुका पुत्र भगवान श्री हरि विष्णु जी के छठे अवतार समस्त शस्त्र एवं शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम का वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के दिन प्राकट्य हुआ। देवों के पूजनीय, जन्म से ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने में स्थिर, स पूर्ण तेज से युक्त, स पूर्ण योगियों के ईश्वर, सभी के पाप, ताप, संताप, रोग का हरण करने वाले सुंदर शोभनीय स्वरूप वाले शत्रुओं के संहारक रेणुका एवं जमदग्निपुत्र परशुराम समस्त सनातन जगत के आराध्य हैं।

Parshuram Jayanti 2026

भगवान श्री हरि विष्णु जी ने अहंकार और घमंड में चूर दुष्ट राजाओं के मान-मर्दन हेतु भगवान परशुराम जी के रूप में अवतार लिया। हैहय वंश के अधिपति कार्तवीर्य अर्जुन ने भगवान नारायण के अंशावतार भगवान दत्तात्रेय से युद्ध में अपराजेय होने का वर प्राप्त कर लिया। वर में एक हजार भुजाएं प्राप्त करने से उसका नाम सहस्रार्जुन भी था। एक समय वह भगवान परशुराम जी के पिता ऋषि जमदग्नि जी के आश्रम में आया। वहां वह कामधेनु गाय की कृपा से आश्रम का ऐश्वर्य देख बलपूर्वक गाय को ले गया।

जब भगवान परशुराम जी आश्रम लौटे तो पिता जी से राजा के दुष्कृत्य का वृत्तांत जानकर उन्होंने मार्ग में ही सहस्रार्जुन को रोककर उससे युद्ध किया तथा उसकी सहस्र भुजाएं काटकर वध कर दिया। अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिए सहस्रार्जुन के पुत्रों ने भगवान परशुराम जी की अनुपस्थिति में उनके पिता ऋषिजमदग्नि जी का वध कर दिया। तब भगवान परशुराम जी ने उन उद्दंड राजाओं को दंडित करने के लिए भगवान शिव द्वारा प्रदान अमोघ परशु से युद्ध कर आततायी अधर्मी राजाओं को 21 बार दंडित कर प्रजा को भयमुक्त किया।

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धर्म से द्वेष करने वाले अन्यायियों का दमन करने के लिए तथा जगत की रक्षा के लिए भगवान परशुराम जी ने परशु को धारण किया। भगवान परशुराम जी सनातन मर्यादा के रक्षक हैं। जब सीता जी के स्वयंवर के समय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी ने शिव धनुष तोड़ा, तब भृगुकुल नंदन भगवान परशुराम जी राजा जनक के राज दरबार में पधारे। तब तुलसीदास जी भगवान परशुराम जी की पावन छवि का वर्णन करते हुए यह कहते हैं :

बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥
कटि मुनिबसन तून दुइ बांधें। धनु सर कर कुठारु कल कांधें॥

बैल के समान ऊंचे और पुष्ट कंधे हैं, छाती और भुजाएं विशाल हैं। सुंदर यज्ञोपवीत धारण किए, माला पहने और मृगचर्म लिए हैं। कमर में मुनियों का वस्त्र (वल्कल) और दो तरकश बांधे हैं। हाथ में धनुष-बाण और सुंदर कंधे पर फरसा धारण किए हैं। जब भगवान परशुराम सभा में पधारे तो वहां उपस्थित सभी राजा उनके क्रोधित रूप को देख भय से व्याकुल हो गए। भगवान परशुराम के महान पराक्रम से अधर्मी राजा थर-थर कांपते थे।

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भगवान शिव से उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मंत्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। शस्त्रविद्या के महान ज्ञाता भगवान परशुराम ने भीष्म, द्र्रोण तथा कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की। उन्होंने अश्वमेध महायज्ञ का आयोजन कर सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महॢष कश्यप जी को दान कर दी थी। ब्रह्म वैवर्तपुराण के अनुसार एक समय कैलाश में प्रवेश करते समय भगवान परशुराम को गणेश जी द्वारा रोके जाने पर, दोनों में युद्ध प्रारंभ हो गया। उनके फरसे  के प्रहार से गणेश जी का दांत टूट गया जिससे वह एकदंत कहलाए।

परशुराम जी भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। उनके पिता जमदग्नि ऋषि भृगुवंशी ऋचीक ऋषि जी के पुत्र थे जिनकी गणना सप्तऋषियों में होती है। धर्म की स्थापना हेतु भगवान परशुराम जी ने हर युग के किसी न किसी कालखंड में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी वह महेन्द्र पर्वत पर समाधिस्थ हैं। भगवान परशुराम जी ने सामाजिक न्याय तथा समानता की स्थापना के उद्देश्य से तथा समाज के शोषित तथा पीड़ित वर्ग के अधिकारों की रक्षा हेतु शस्त्र उठाया। भगवान परशुराम की महान पितृ तथा मातृ भक्ति वंदनीय है। उन्होंने समस्त पृथ्वी को दान स्वरूप कश्यप ऋषि जी को प्रदान किया। भगवान परशुराम जी की क्षमाशीलता, दानशीलता, सनातन मर्यादा, न्यायप्रियता, मातृ-पितृ भक्ति, समस्त मानवीय समाज के लिए अनुकरणीय एवं वंदनीय है।

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