Pandit Madan Mohan Malaviya Story : मदन मोहन मालवीय जी की इस कहानी से जानें, कंजूसी और उदारता का असली फर्क

Edited By Updated: 22 May, 2026 03:51 PM

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महामना मदन मोहन मालवीय की इच्छा थी कि काशी में एक विश्वविद्यालय बने। इसके लिए वह समाज के संपन्न व्यक्तियों से धन के सहयोग की प्रार्थना करते थे। एक दिन वह अपने मित्र के साथ एक बड़े व्यापारी से सहयोग लेने उनके घर पहुंचे।

Pandit Madan Mohan Malaviya Story : महामना मदन मोहन मालवीय की इच्छा थी कि काशी में एक विश्वविद्यालय बने। इसके लिए वह समाज के संपन्न व्यक्तियों से धन के सहयोग की प्रार्थना करते थे। एक दिन वह अपने मित्र के साथ एक बड़े व्यापारी से सहयोग लेने उनके घर पहुंचे। तब तक अंधेरा छाने लगा था। सेठ ने अपने बेटे को बैठक में लालटेन जलाने को कहा। पुत्र लालटेन और माचिस लेकर आया। उसने माचिस की तीन तीलियां जलाईं पर तीनों लालटेन तक आते-आते बुझ गईं। 

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सेठ लड़के पर नाराज होकर बोले, “तुमने माचिस की तीनों तीलियां नष्ट कर दीं। कितने लापरवाह हो?”

सेठ अतिथियों के लिए नाश्ता पानी मंगवाने भीतर गए। मालवीय ने अपने मित्र से कहा, “इस कंजूस से कुछ पाने की आशा मत करो, वह तो माचिस की तीन तीलियों के नष्ट हो जाने पर लड़के को डांटता है। मित्र ने सहमति जताई। इतने में सेठ आ गए तो मालवीय और उसके मित्र उठ खड़े हुए। वह सेठ से बोले, “अब अनुमति दें। ” 

सेठ ने कहा, “आप लोग क्यों चल दिए। आने का उद्देश्य तो बताया ही नहीं। इस पर मालवीय के मित्र ने सेठ को संक्षेप में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण के बारे में बताया। सेठ ने कहा, “यह तो बड़ा अच्छा है।” 

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इसके बाद सेठ ने तुरंत पच्चीस हजार रुपए सामने रख दिए।

अब चौंकने की बारी इन लोगों की थी। मालवीय ने कहा, “अभी आपने लड़के को माचिस की तीन तीलियां नष्ट करने पर डांटा था, पर विश्वविद्यालय के लिए पच्चीस हजार रुपए दे दिए। इन दोनों व्यवहारों में इतना अंतर क्यों?” 

सेठ बचत का महत्व बताते हुए बोले, ‘‘महामना, मेरा सोचना ऐसा है कि व्यर्थ ही माचिस की एक तीली भी नहीं जानी चाहिए, पर किसी बड़े काम में सामर्थ्य के अनुसार सहर्ष सहयोग देना चाहिए।’’

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