Edited By Sarita Thapa,Updated: 15 Mar, 2026 04:46 PM

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को महादेव की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रभावशाली मार्ग माना गया है। जब यह व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि सोमवार स्वयं भगवान शिव का प्रिय दिन है।
Som Pradosh Vrat Katha : हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को महादेव की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रभावशाली मार्ग माना गया है। जब यह व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि सोमवार स्वयं भगवान शिव का प्रिय दिन है। मान्यता है कि सोम प्रदोष के दिन सूर्यास्त के समय, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है, भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं और अपने भक्तों के बड़े से बड़े कष्टों का निवारण कर देते हैं। यदि आपके जीवन में आर्थिक तंगी है, मानसिक अशांति रहती है या बनते हुए काम बिगड़ रहे हैं, तो सोम प्रदोष का व्रत और इसकी पौराणिक कथा का श्रवण आपकी सोई हुई किस्मत को जगाने की शक्ति रखता है। यह कथा न केवल हमें धैर्य और अटूट श्रद्धा की सीख देती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे महादेव की भक्ति एक दरिद्र को भी वैभवशाली बना सकती है। तो आइए, जानते हैं कि क्यों यह व्रत कथा हर शिव भक्त के लिए वरदान माना जाता है।
सोम प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है, एक ब्राह्मणी थी जो अपने पति की मृत्यु के बाद अत्यंत दरिद्र हो गई थी। वह अपने छोटे पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर अपना जीवन निर्वाह करती थी। एक दिन, जब वह भिक्षा मांगकर घर लौट रही थी, तो उसे नदी के किनारे एक सुंदर बालक मिला, जो विदर्भ देश का राजकुमार था। पड़ोसी राज्य के आक्रमण के कारण उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और वह बेसहारा भटक रहा था। दयालु ब्राह्मणी उस राजकुमार को अपने साथ घर ले आई और अपने पुत्र की तरह ही उसका पालन-पोषण करने लगी।

एक दिन ब्राह्मणी अपने दोनों बच्चों के साथ ऋषि शांडिल्य के आश्रम पहुँची। वहां ऋषि ने उसे सोम प्रदोष व्रत के महत्व के बारे में बताया और विधि-विधान से शिव पूजा करने की सलाह दी। ब्राह्मणी ने ऋषि की आज्ञा मानकर पूरी श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया और दोनों बालकों को भी इसकी प्रेरणा दी। कुछ समय बीतने पर, दोनों बालक जंगल में विहार कर रहे थे, जहां उनकी मुलाकात गंधर्व कन्याओं से हुई। राजकुमार की सादगी और स्वभाव से प्रभावित होकर गंधर्व राज ने अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह उस राजकुमार के साथ कर दिया। विवाह के पश्चात, गंधर्व राज की विशाल सेना की मदद से राजकुमार ने अपने खोए हुए राज्य 'विदर्भ' पर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया और राजा बना। राजकुमार ने अपनी उपकारी ब्राह्मणी मां और उसके पुत्र को अपना मंत्री बनाया और उन्हें अपार सुख-सुविधाएं प्रदान कीं।

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