Edited By Sarita Thapa,Updated: 29 May, 2026 02:31 PM

इस प्रसंग में यह नहीं सोच लेना चाहिए कि भगवान के पास कोई काम नहीं है। वे अपने वैकुंठलोक में सदैव व्यस्त रहते हैं। ब्रह्मïसंहिता में (5.6) कहा गया है-आत्मारामस्य तस्यास्ति प्रकृत्या न समागम
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥9.9॥
अनुवाद : हे धनञ्जय! ये सारे कर्म मुझे नहीं बांध पाते हैं। मैं उदासीन की भांति इन सारे भौतिक कर्मों से सदैव विरक्त रहता हूं।
तात्पर्य : इस प्रसंग में यह नहीं सोच लेना चाहिए कि भगवान के पास कोई काम नहीं है। वे अपने वैकुंठलोक में सदैव व्यस्त रहते हैं। ब्रह्मïसंहिता में (5.6) कहा गया है-आत्मारामस्य तस्यास्ति प्रकृत्या न समागम:- वे सतत दिव्य आनंदमय आध्यात्मिक कार्यों में रत रहते हैं, किन्तु इन कार्यों से उनका कोई सरोकार नहीं रहता।
सारे भौतिक कार्य उनकी विभिन्न शक्तियों द्वारा स पन्न होते रहते हैं। वे सदा ही इस सृष्टिï के भौतिक कार्यों के प्रति उदासीन रहते हैं। इस उदासीनता को ही यहां पर उदासीनवत् कहा गया है। यद्यपि छोटे से छोटे भौतिक कार्य पर उनका नियंत्रण रहता है, किन्तु वे उदासीनवत् स्थित रहते हैं।

यहां पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का उदाहरण दिया जा सकता है जो अपने आसन पर बैठा रहता है। उसके आदेश से अनेक तरह की बातें घटती रहती हैं। किसी को फांसी दी जाती है, किसी को कारावास की सजा मिलती है तो किसी को प्रचुर धनराशि मिलती है, तो भी वह उदासीन रहता है। उसे इस हानि-लाभ से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता।
इसी प्रकार भगवान भी सदैव उदासीन रहते हैं यद्यपि प्रत्येक कार्य में उनका हाथ रहता है। वेदांतसूत्र में (2.1.34) यह कहा गया है- वैष यनैर्घृण्ये न - वे इस जगत के द्वंद्वों में स्थित नहीं हैं। वे इन द्वंद्वों से अतीत हैं। न ही इस जगत की सृष्टिï तथा प्रलय में ही उनकी आसक्ति रहती है। सारे जीव अपने पूर्वकर्मों के अनुसार विभिन्न योनियां ग्रहण करते रहते हैं और भगवान इसमें कोई व्यावधान नहीं डालते।

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