Vikata Sankashti Chaturthi 2026 : संकट टलेंगे और खुलेगा भाग्य का द्वार ! विकट संकष्टी पर जरूर पढ़े यह पौराणिक कथा

Edited By Updated: 05 Apr, 2026 10:03 AM

vikata sankashti chaturthi 2026

हिंदू धर्म में किसी भी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब विधि-विधान से पूजन के साथ-साथ उस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा का श्रवण या पठन किया जाए।

Vikata Sankashti Chaturthi 2026 : हिंदू धर्म में किसी भी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब विधि-विधान से पूजन के साथ-साथ उस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा का श्रवण या पठन किया जाए। 5 अप्रैल 2026 को मनाई जाने वाली विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के 'विकट' स्वरूप की पूजा की जाती है। यह व्रत न केवल कष्टों को हरता है, बल्कि साधक के जीवन में धैर्य और साहस का संचार भी करता है। यदि आप भी इस दिन उपवास रख रहे हैं, तो आइए जानते हैं इस व्रत की कथा। 

Vikata Sankashti Chaturthi 2026

विकट संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा
पौराणिक काल में कामासुर नाम का एक अत्यंत पराक्रमी दैत्य हुआ। उसने भगवान शिव की घोर तपस्या की और अपनी भक्ति से महादेव को प्रसन्न कर लिया। वरदान स्वरूप उसने 'अजेय' होने की शक्ति मांग ली। शिव जी के वरदान ने उसे इतना शक्तिशाली बना दिया कि उसके मन में अहंकार का संचार हो गया। शक्ति के मद में चूर होकर कामासुर ने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और इंद्र सहित सभी देवताओं को पराजित कर उन्हें बंदी बना लिया। तीनों लोकों में उसके आतंक से हाहाकार मच गया। जब विवश होकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे, तो शिव जी ने स्पष्ट किया कि कामासुर उनके ही वरदान से सुरक्षित है, इसलिए उसका अंत केवल विघ्नहर्ता श्री गणेश ही कर सकते हैं।

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देवताओं ने संकट से मुक्ति पाने के लिए भगवान गणेश की सामूहिक स्तुति और कठोर आराधना की। देवताओं की पुकार सुनकर गणपति ने एक अत्यंत विशाल और तेजस्वी रूप धारण किया, जिसे 'विकट' स्वरूप कहा गया। मोर पर सवार होकर भगवान गणेश युद्ध भूमि में कामासुर के सामने प्रकट हुए। भगवान गणेश के इस अलौकिक और भयंकर तेज को देखकर कामासुर का आत्मविश्वास डगमगा गया। गणेश जी ने अपनी दिव्य शक्तियों और युद्ध कौशल से कामासुर की सेना को तितर-बितर कर दिया और उसके घमंड को मिट्टी में मिला दिया। संकट टलेंगे और खुलेगा भाग्य का द्वार! विकट संकष्टी पर जरूर सुनें यह पौराणिक कहानी।जब कामासुर को अपनी भूल और भगवान गणेश की सर्वोच्च सत्ता का आभास हुआ, तो उसने तुरंत युद्ध छोड़ दिया और बप्पा के चरणों में गिरकर अपने अपराधों की क्षमा मांगी। दयालु गणेश जी ने उसके पश्चाताप को देखते हुए उसे अभयदान दिया और देवताओं को उसके दमनकारी शासन से मुक्त कराया।

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