सामान्य पूर्णिमा से अलग क्यों मानी जाती है कार्तिक पूर्णिमा?

Edited By Updated: 10 Apr, 2020 04:55 PM

why kartik purnima called tripurari purnima

हिंदू पंचांग के अनुसा पूर्णिमा तिथि प्रत्येक मास की 15वीं और शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को पड़ती है। मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा तिथि के दिन चंद्रमा आकाश में अपने पूरे आकार में होता है।

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हिंदू पंचांग के अनुसा पूर्णिमा तिथि प्रत्येक मास की 15वीं और शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को पड़ती है। मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा तिथि के दिन चंद्रमा आकाश में अपने पूरे आकार में होता है। कहा जाता है इस दिन का भारतीय जनजीवन में अत्यधिक महत्व है। इसके साथ ही प्रत्येक मास की पूर्णिमा तिथि पर हिंदू धर्म का कोई न कोई खास पर्व व त्यौहार भी अवश्य पड़ता है। अब ये तो सामान्य पूर्णिमा तिथि की। अब बात करते है एक खास पूर्णिमा की तिथि की। जो आती है कार्तिक माह में। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक वर्ष में कार्तिक माह में पड़ने वाली पूर्णिमा को समस्त पूर्णिमा तिथियों की तुलना में खास माना जाता है, जिस हिंदू धर्म में त्रिपुरारी पूर्णिमा कहा जाता है। बता दें हिंदू पंचांग के मुताबिक महीने के 30 दिन को चंद्रा कला के आधार पर 15-15 दिन को 2 पक्षों में बांटा गया है जिसमें से एक है शुक्ल पक्ष तथा दूसरा है कृष्ण पक्ष। जिसमें से शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन को पूर्णिमा को कहते हैं तथा कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन को अमावस्या कहते हैं।
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पूर्णिमा को हिंदू धर्म में किसी पर्व से कम नहीं माना जाता। कहा जाता है जो भी व्यक्ति चाहे महिला हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध इस दिन व्रत करता है और इसे पूरे नियम से करता है उसे अपनी इच्छा अनुसार फल प्राप्त होता है। इस दौरान गंगा और अन्य नदिओं में स्ना, दीप दान, वस्त्र और अन्न दान आदि करने का सभी और दिनों की अपेक्षा में कई गुना माना जाता है। कुछ धार्मिक मान्यताओं है कि जो भी जातक इस विशेष व पावन दिन व्रत आदि करने के बाद बछड़ा दान करने से शिव लोक की प्राप्ति होती है।

पौराणिक कथाओं की मानें तो इसी दिन भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचने के लिए मतस्य अवतार रूप में जन्म लिया था। तो वहीं एक अन्य किंवंदति के अनुसार महाभारत के युद्ध के उपरांत युधिष्ठिर विचलित हो गए कि 18 दिन के भयंकर युद्ध में उनके सगे संबंधी मृत्यु को प्राप्त हो गए। ऐसे मे उन्हें इस बात की समझ नहीं आ रही कैसे वो अपनवे मन की आशांति को दूर करें और उन सबको आत्मा को शांति प्रदान करें। तब तब श्री कृष्ण ने उन्हें अपने पितरों की तृप्ति के लिए के लिए एक उपाय बताया, जिसके अनुसार उन्हें गढ़ मुक्तेश्वर में स्नान करके दीपदान करना था तथा अपने पित्तरो का  तर्पण करें। ऐसा माना जाता है महाभारत काल में युधिष्ठिर द्वारा इस पंरपंरा को किए जानें के बाद इसका प्रचलन शुरू हुआ।
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अब जानते हैं कि कार्तिक पूर्णिमा को कैसे और क्यो मिला त्रिपुरारी नाम-
पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा नाम भगवान शंकर से मिला था। कथाओं में जो उल्लेख मिलता है कि उसके अनुसार भगवान शिव ने अजर अमर त्रिपुरासुर नामक असुर का संहार किया था। जिसके खात्म से तीनो लोकों में फिर से धर्म की स्थापना कर दी गई है। मान्यता इसी बाद इस दिन को त्रिपुरारी पूर्णिमा कहा जाने लगा। बता दें इसे देव दीपावली के नाम से भी जाना जाता है।
यहां जानें कब है 2020 में कब मनाई जाएगी कार्तिक माह की पूर्णिमा

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - नवम्बर 29, 2020 को 12:47 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त - नवम्बर 30, 2020 को 14:59 बजे

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