दुनिया को जानना चाहिए कि क्यों बड़े-बड़े लोग भी नीम करौली बाबा में आस्था रखते हैं: विशाल चतुर्वेदी

Edited By Updated: 27 Jul, 2026 12:50 PM

hanuman ansh exclusive interview with navodayatimes news

फिल्म के बारे में एक्टर शोभिनव सत्या और डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी फिल्म 'हनुमान अंश' जल्द ही सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। यह फिल्म आध्यात्मिक गुरु नीम करौली बाबा के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित है। फिल्म में शोभिनव सत्या मुख्य भूमिका निभा रहे हैं और वह बाबा के किरदार में नजर आएंगे। इसके अलावा विहान एस. हेगड़े, चंदन आनंद, पूर्णिमा तिवारी, अनिल के. रस्तोगी और गुलशन पांडे भी अहम भूमिकाओं में दिखाई देंगे। फिल्म के जरिए दर्शकों को नीम करौली बाबा के जीवन, उनके विचारों और आध्यात्मिक यात्रा से रूबरू कराने की कोशिश की गई है।फिल्म के बारे में एक्टर शोभिनव सत्या और डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्सजगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

विशाल चतुर्वेदी

सवाल: सबसे पहले आपसे जानना चाहूंगा कि नीम करौली बाबा जैसे महान संत पर फिल्म बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया? आपका उनसे जुड़ाव कैसे हुआ?

जवाब: जब मैं आज अपनी पूरी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूं, तो महसूस होता है कि यह फिल्म कहीं न कहीं बाबा की प्रेरणा और उनकी ही कृपा से बन सकी। आध्यात्मिक विभूतियों के जीवन को पर्दे पर उतारना आसान नहीं होता। इसके लिए वर्षों की तपस्या, संघर्ष और धैर्य की जरूरत होती है। मेरी यह यात्रा करीब 20 साल पहले शुरू हुई थी, जब मैं भगवान में ज्यादा आस्था नहीं रखता था। मैं खुद को नास्तिक मानता था और केवल ब्रह्मांड तथा ऊर्जा पर विश्वास करता था।

साल 2006 में एक दिन मेरी कार अचानक कैंची धाम के मुख्य द्वार पर जाकर रुक गई। उस समय तेज बारिश और घना कोहरा था, लेकिन कुछ ही पलों में मौसम साफ हो गया। मैं और मेरा मित्र करीब डेढ़-दो घंटे आश्रम में रुके। लौटते समय उसने पहली बार मुझे नीम करौली बाबा के जीवन और उनके चमत्कारों के बारे में विस्तार से बताया। एक डॉक्टर होने के कारण उन बातों पर तुरंत विश्वास करना मेरे लिए आसान नहीं था, लेकिन उसी दिन से मैंने बाबा के जीवन और उनके कार्यों के बारे में गंभीरता से पढ़ना और जानना शुरू कर दिया।


सवाल: यह कहानी फिल्म तक कैसे पहुंची?

जवाब: कुछ समय बाद मेरी मुलाकात IB7 के पूर्व पत्रकार कुणाल माधव से हुई। संयोग से वह भी नीम करौली बाबा के भक्त थे। जब भी किसी पार्टी या कार्यक्रम में हमारी मुलाकात होती, बाकी लोग अपनी बातचीत में व्यस्त रहते, जबकि हम घंटों सिर्फ महाराज जी और उनके जीवन से जुड़े अनुभवों पर चर्चा करते। धीरे-धीरे उनके जीवन पर फिल्म बनाने का विचार मेरे मन में और मजबूत होता गया।

साल 2021-22 तक मुझे पूरी तरह विश्वास हो गया कि बाबा की कहानी दुनिया तक पहुंचनी चाहिए। हालांकि, जब भी मैं इस विषय पर किसी से बात करता, ज्यादातर लोगों का कहना होता कि ऐसी फिल्म के लिए बड़ा सुपरस्टार, भारी-भरकम बजट और बड़े स्तर की तैयारी चाहिए। इन बातों को सुनकर मैं कुछ समय के लिए रुक जाता था, लेकिन मन में यह सपना हमेशा जिंदा रहा।


सवाल: आखिर में फिल्म बनने की शुरुआत कैसे हुई?

जवाब: एक दिन मैं एक बड़े OTT प्लेटफॉर्म के पास अपनी दूसरी कहानी लेकर गया था। बातचीत के दौरान मुझसे पूछा गया कि क्या मेरे पास ऐसी कोई भारतीय कहानी है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रासंगिकता हो। मुझे तुरंत लगा कि नीम करौली बाबा की कहानी से बड़ी भारतीय कहानी शायद इस समय कोई नहीं हो सकती। मैंने उन्हें बताया कि दुनिया को यह जानना चाहिए कि आखिर क्यों Apple, Meta और Twitter जैसी वैश्विक कंपनियों से जुड़े कई बड़े नाम भी बाबा में आस्था रखते हैं।

मैंने पूरी कहानी सुनाई, लेकिन उनकी ओर से कोई खास उत्साह नहीं दिखा। उन्होंने साफ कहा कि वे इस तरह की कहानी की तलाश में नहीं हैं। उनकी यह प्रतिक्रिया मेरे लिए निराशाजनक थी। उसी पल मुझे एहसास हुआ कि हमारी आध्यात्मिक विरासत की कहानियों को वह महत्व नहीं मिल रहा, जिसकी वे हकदार हैं। तभी मैंने तय कर लिया कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, यह फिल्म मैं हर हाल में बनाऊंगा।

सवाल: जब आपने फिल्म बनाने का फैसला कर लिया तो टीम कैसे जुड़ती चली गई?

जवाब: इसके बाद मैंने ऐसे लोगों की तलाश शुरू की, जो इस विषय और बाबा की महिमा पर सच्चे मन से विश्वास करते हों। सबसे पहले मैंने रागिनी सोना जी से बात की। हम कई वर्षों से साथ मिलकर नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करते रहे हैं, इसलिए मुझे उनकी श्रद्धा पर पूरा भरोसा था। मैंने उनसे पूछा कि क्या वे इस फिल्म का निर्माण करना चाहेंगी, और उन्होंने तुरंत सहमति जताई।

इसके बाद नम्रता सिंह और अनुप्रिया नागर भी इस यात्रा का हिस्सा बन गईं। खास बात यह रही कि नम्रता सिंह ने इससे पहले कभी कोई फिल्म प्रोड्यूस नहीं की थी, लेकिन बाबा के प्रति अपनी आस्था के कारण उन्होंने पूरे उत्साह के साथ इस प्रोजेक्ट को अपनाया। धीरे-धीरे सही लोग जुड़ते गए, तमाम चुनौतियां भी आईं, लेकिन हर बाधा पार होती गई और आखिरकार फिल्म पूरी होकर तैयार हो गई। अब इसका ट्रेलर रिलीज हो चुका है और 31 जुलाई को दर्शक इसे सिनेमाघरों में देख सकेंगे।

सवाल: निर्देशक के तौर पर आपको कब विश्वास हो गया कि यही कलाकार इस भूमिका के लिए सही है?

जवाब: जब मैंने शोभनव को करीब से देखा तो सिर्फ उनका चेहरा ही नहीं, बल्कि उनका स्वभाव भी मुझे इस किरदार के लिए उपयुक्त लगा। उनकी मुस्कान, लोगों से बात करने का तरीका और सहज व्यवहार मुझे बहुत प्रभावित करता था।

नीम करौली बाबा बेहद सरल, हंसमुख और विनोदी स्वभाव के थे। वे लोगों से मजाक भी करते थे और जरूरत पड़ने पर कठोर भी हो जाते थे, लेकिन हर परिस्थिति पर उनका पूरा नियंत्रण रहता था। मुझे लगा कि शोभनव के स्वभाव में भी वही सहजता मौजूद है। इसलिए मुझे उन्हें पूरी तरह बदलने की जरूरत नहीं थी। मुझे सिर्फ उनके व्यक्तित्व को सही दिशा देनी थी।

सवाल: आपको क्या लगता है कि इस भूमिका को निभाना आपके लिए आसान क्यों रहा?

जवाब: क्योंकि शोभनव पहले से ही आध्यात्मिक जीवन से जुड़े हुए थे। उनमें हनुमान जी के प्रति श्रद्धा थी और उनका जीवन भी काफी सात्विक था। अगर मैं किसी ऐसे अभिनेता को लेता जिसकी जीवनशैली पूरी तरह अलग होती, तो मुझे उसे इस भूमिका के लिए तैयार करने में कई महीने लग जाते। लेकिन शोभनव पहले से ही उस मानसिक और आध्यात्मिक धरातल पर थे, इसलिए मेरा छह महीने का काम लगभग छह घंटे में पूरा हो गया।

मुझे शुरू से विश्वास था कि यह किरदार वही निभा सकते हैं। आखिरकार, जब भगवान किसी से कोई काम करवाना चाहते हैं, तो वही व्यक्ति उस काम के लिए चुना जाता है। अगले भाग में दोनों बताएंगे कि नीम करौली बाबा से उन्होंने क्या सीखा, शूटिंग के दौरान हुए अनुभव, आध्यात्मिक बदलाव, थिएटर बनाम सिनेमा और फिल्म निर्माण के दौरान आए संघर्ष।

शोभिनव सत्या  

सवाल: सबसे पहले यह बताइए कि आपको कब पता चला कि आप इस फिल्म का हिस्सा बनने वाले हैं? 

जवाब: असल में इस फिल्म से मेरी शुरुआत अभिनय के जरिए नहीं, बल्कि असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में हुई थी। जब फिल्म की तैयारियां चल रही थीं, उसी दौरान मेरे चाचा जी का निधन हो गया। मैं गांव में अंतिम संस्कार और पारिवारिक रस्मों में व्यस्त था, तभी टीम का फोन आया कि फिल्म की शूटिंग शुरू होने वाली है और मुझे जल्द मुंबई पहुंचना है। सभी जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद मैं तुरंत मुंबई लौट आया और असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम शुरू कर दिया। लेकिन शायद बाबा की इच्छा कुछ और ही थी।

शूटिंग के दौरान बाबा का किरदार निभाने वाले कलाकार की तबीयत अचानक खराब हो गई। तभी निर्देशक की नजर मुझ पर गई। कई लोग पहले से कहते थे कि मेरा चेहरा महाराज जी से काफी मिलता-जुलता है। निर्देशक ने मुझसे कहा कि सिर्फ लुक का मिलना काफी नहीं है, अभिनय भी उतना ही प्रभावशाली होना चाहिए। उन्होंने कोई झूठी उम्मीद नहीं दी और साफ कहा कि पहले यह देखना होगा कि मैं इस किरदार को निभा भी सकता हूं या नहीं। इसके बाद उन्होंने करीब चार घंटे तक मुझे इस भूमिका की हर बारीकी समझाई और वहीं से मेरे अभिनेता बनने की यात्रा शुरू हुई।

सवाल: निर्देशक ने आपको इस किरदार के लिए किस तरह तैयार किया?

जवाब: निर्देशक ने मुझे सिर्फ संवाद याद करने के लिए नहीं कहा, बल्कि सबसे पहले बाबा के व्यक्तित्व को समझाया। उन्होंने बताया कि सिर कैसे झुकाना है, किस तरह मुस्कुराना है, किस लहजे में बात करनी है, लोगों से कैसे मिलना है और भावनाओं को किस तरह व्यक्त करना है। उन्होंने मेरी कुछ स्वाभाविक आदतों को भी इस किरदार के साथ जोड़ा, ताकि अभिनय बनावटी न लगे, बल्कि पूरी तरह सहज और वास्तविक महसूस हो।

हम सभी असिस्टेंट डायरेक्टर रोज बैठकर पूरी स्क्रिप्ट पढ़ते थे, इसलिए संवाद मुझे पहले से याद थे। लेकिन किसी किरदार को निभाना और उसे जीना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। निर्देशक ने करीब 20 वर्षों के अपने शोध और लोगों के अनुभवों के आधार पर मुझे महाराज जी के व्यक्तित्व की हर बारीकी समझाई। बाबा की तस्वीरें और आवाज की रिकॉर्डिंग बेहद सीमित हैं, इसलिए उन्हीं अनुभवों के जरिए मैंने इस किरदार को आत्मसात करने की कोशिश की। मुझे लगता है कि बाबा की कृपा और निर्देशक के मार्गदर्शन की बदौलत ही मैं इस भूमिका को निभा सका। उम्मीद है कि जब दर्शक फिल्म देखेंगे, तो उन्हें महसूस होगा कि बाबा वास्तव में ऐसे ही बोलते, मुस्कुराते और लोगों से मिलते होंगे।


सवाल: आपने अभिनय के दौरान सबसे बड़ी चुनौती क्या महसूस की?

जवाब: सबसे बड़ी चुनौती लोगों की अपेक्षाएं थीं। मेरे मन में लगातार यह सवाल चलता था कि लोग क्या सोचेंगे? क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे? क्या वे मेरी तुलना किसी दूसरे कलाकार से करेंगे? तब निर्देशक सर ने मुझसे कहा कि यह सब सोचना तुम्हारा काम नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर लोग फिल्म को पसंद करेंगे या आलोचना करेंगे, तो उसकी जिम्मेदारी निर्देशक की होगी। एक अभिनेता का काम सिर्फ पूरी ईमानदारी से अपने किरदार को जीना होता है। उस दिन के बाद मैंने सारी चिंताएं छोड़ दीं और पूरी तरह इस भूमिका में डूब गया।


सवाल: जब कोई कलाकार किसी महान संत का किरदार निभाता है तो उससे बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है। आपने नीम करौली बाबा के जीवन और व्यक्तित्व से क्या सीखा?

जवाब: इस किरदार ने मुझे सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि जीवन की कई महत्वपूर्ण बातें भी सिखाईं। फिल्म में मुझे जनेऊ धारण कराया गया था। शूटिंग पूरी होने के बाद जब मैं कैंची धाम गया, तो मैंने वह जनेऊ वहीं अर्पित कर दिया। हालांकि, उससे पहले करीब छह महीने तक मैंने उससे जुड़ी सभी मर्यादाओं और परंपराओं का पूरी श्रद्धा के साथ पालन किया। बाबा ब्राह्मण थे, इसलिए जनेऊ की पवित्रता और उससे जुड़ी मान्यताओं को समझने की कोशिश की, जिसने मुझे अपनी संस्कृति और जड़ों से और करीब ला दिया।

इस यात्रा के दौरान मुझे यह भी महसूस हुआ कि बाबा की कहानी कई बार पीछे मुड़कर देखने पर ही समझ आती है। जब निर्देशक सर ने बताया कि उन्हें करीब 20 साल पहले इस फिल्म की प्रेरणा मिली थी, तो मुझे लगा कि शायद मेरी तैयारी भी उसी समय से शुरू हो चुकी थी। साल 2018 से मेरे जीवन में कई बदलाव आए, मैं नियमित रूप से हनुमान जी की उपासना, सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा और सात्विक जीवन अपनाया। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि शायद बाबा मुझे इसी भूमिका के लिए तैयार कर रहे थे। मेरे लिए यह फिल्म सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि जीवनभर की एक अनमोल स्मृति और आध्यात्मिक अनुभव बन गई है।

सवाल: क्या बचपन से आपका सपना अभिनेता बनने का था या फिर आप निर्देशन में ही करियर बनाना चाहते थे?

जवाब: जब कोई इस क्षेत्र में आता है तो शुरुआत थिएटर से ही होती है। थिएटर आपको सिर्फ अभिनय नहीं सिखाता, बल्कि हर काम करना सिखाता है। शुरुआती दिनों में चाय परोसने से लेकर मंच की व्यवस्था करने तक हर जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। वहीं से समझ आता है कि एक नाटक या फिल्म सिर्फ कलाकारों से नहीं, बल्कि पूरी टीम के सहयोग से बनती है।

मैं थिएटर में अभिनय भी करता था, लेखन भी करता था और निर्देशन से जुड़े काम भी सीख रहा था। लेकिन समय के साथ मेरा झुकाव निर्देशन की ओर बढ़ गया और मैंने असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करना शुरू कर दिया। उस दौरान मैंने कभी नहीं सोचा था कि दोबारा अभिनय करूंगा। लेकिन शायद मेरी नियति कुछ और ही थी। बाबा ने मुझे फिर उसी रास्ते पर वापस ला खड़ा किया।

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