Edited By ,Updated: 27 Mar, 2015 12:26 AM

जिला चम्बा के जनजातीय भू-भाग पांगी के मिंधल गांव की रोचक बात यह है कि यहां आज भी गांववासी मिंधल माता की आज्ञा से एक ही बैल से हल जोतते हैं।
केलांग: जिला चम्बा के जनजातीय भू-भाग पांगी के मिंधल गांव की रोचक बात यह है कि यहां आज भी गांववासी मिंधल माता की आज्ञा से एक ही बैल से हल जोतते हैं। गांववासियों का मानना है कि ऐसा यहां मिंधल माता के श्राप के कारण आज भी एक ही बैल से खेती की जाती है। यहां पर कभी मिंधलवासी चारपाई पर सोना भी पाप मानते थे। गलती से कोई चारपाई पर सो भी जाए तो कोई अदृश्य शक्ति चारपाई को पलट देती थी लेकिन चारपाई वाली बात अब गुजरे जमाने की हो गई है। इस मंदिर स्थल पर भादो महीने की पूर्णमासी को मेला लगता है तथा कई देवताओं के रथ भी इसी मेले में भाग लेने के लिए दूर-दूर से आते हैं।
किंवदंति है कि किसी समय मिंधल गांव में एक विधवा बूढ़ी महिला रहती थी। उसके 7 पुत्र थे जो सभी विवाहित थे। एक बार बुढिय़ा ने खाना बनाते समय अपने पतीले में पत्थर की पिंडी को देखा जिससे आवाज निकली कि मैं मिंधल हूं व इस गांव में रहना चाहती हूं। मेरी पिंडी की स्थापना कर मेरी इच्छा पूरी करो। यह सुन कर बुढिय़ा खेतों की ओर भागी जहां उसके बेटे व बहुएं काम कर रहे थे। बुढिय़ा ने अपने बेटे व बहुओं को इस अलौकिक घटना की जानकारी दी व इस चमत्कार को देखने के लिए कहा। बेटे व बहुओं ने बुढिय़ा पर विश्वास करने की बजाय बुरा-भला कहा।
सहमी बुढिय़ा जब घर लौटी तो मिंधल माता बोली, तेरे बेटों ने मेरा अनादर किया है तथा तुमने मेरी शक्ति को नहीं पहचाना है। आज से इस गांव में कोई चारपाई पर नहीं सो सकेगा और न ही ऊन कातने का काम करेगा, वहीं 2 बैलों से खेत को भी नहीं जोता जाएगा यह मेरा श्राप है। उसी क्षण बुढिय़ा के बेटे व बहुएंं सब शिलाओं में तबदील हो गए।
जब गांववालों ने सारा दृश्य अपनी आंखों से देखा तो मिंधल माता से माफी मांगने लगे। लोगों ने कहा कि मां हम आपके नाम से यहां भव्य मंदिर बनाएंगे तथा हमें क्षमा कर दो। बुढिय़ा के आग्रह से प्रसन्न होकर माता ने उसे भी उसी स्थल पर मूर्ति बना दिया। आज भी मिंधल माता की मूॢत के साथ बुढिय़ा की प्रणाम की मुद्रा में मूर्ति इस मंदिर के गर्भ गृह में है। आस्था के इस गांव का नामकरण यहां की आराध्य देवी मिंधल माता के नाम पर हुआ है। 15वीं शताब्दी में निर्मित इस त्रिभुजाकार मंदिर में शानदार लकड़ी की नक्काशी की गई है तथा बड़ी संख्या में घंटियां चढ़ाने का रिवाज भी है।
इसलिए चढ़ाई जाती हैं घंटियां
ब्रिटिश काल में लाहौर में राजाओं की राजसी प्रतिस्पर्धा में चम्बा के राजा भूरि सिंह ने मिंधल माता से जीतने की मन्नत रखी थी। विजय प्राप्त होने पर भूरि सिंह ने यहां घंटी व छत्र चढ़ा कर इस परम्परा को शुरू किया। ऐसा माना जाता है कि जो भी यहां सच्चे मन से मन्नत मांगता है उसकी इच्छा जरूर पूरी होती है तथा उसके पश्चात यहां घंटी चढ़ाई जाती है। प्रतिवर्ष जम्मू से श्रद्धालुओं का जत्था यहां पहुंच कर भारी संख्या में घंटियां चढ़ाता है।