Edited By Tanuja,Updated: 16 Jul, 2026 06:01 PM

चीन ने 2000 से 2024 के बीच अफ्रीका के कृषि क्षेत्र में 2.26 अरब डॉलर का निवेश किया, लेकिन अधिकांश धन खेती और सिंचाई तक सीमित रहा। भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था जैसे अहम क्षेत्रों की अनदेखी से चीन की निवेश रणनीति और कथित 'कर्ज जाल' नीति...
International Desk: चीन पिछले दो दशकों से अफ्रीका में अपने निवेश का लगातार विस्तार कर रहा है। सड़क, रेल, बंदरगाह और ऊर्जा परियोजनाओं के बाद अब चीन का फोकस कृषि क्षेत्र पर भी बढ़ा है। हालांकि एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि चीन का निवेश खेती और सिंचाई जैसी परियोजनाओं तक तो सीमित है, लेकिन खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, कोल्ड-चेन और किसानों को बाजार से जोड़ने जैसे सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की अनदेखी की जा रही है। इससे चीन की निवेश नीति और कथित 'डेट ट्रैप (कर्ज जाल) कूटनीति' पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2024 के बीच चीन की वित्तीय संस्थाओं ने अफ्रीका के कृषि क्षेत्र की 41 परियोजनाओं के लिए लगभग 2.26 अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज दिया।
सबसे अधिक निवेश दक्षिणी अफ्रीका के अंगोला, जाम्बिया, जिम्बाब्वे और मोजाम्बिक में हुआ। इसके अलावा इथियोपिया, केन्या, तंजानिया, नाइजीरिया, घाना और मिस्र भी चीनी कृषि निवेश के प्रमुख लाभार्थियों में शामिल हैं। रिपोर्ट बताती है कि चीन ने अपने कृषि निवेश का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा खेती और फसल उत्पादन, जबकि 29 प्रतिशत मत्स्य पालन पर खर्च किया। इसके विपरीत भंडारण और कोल्ड-चेन पर केवल 3 प्रतिशत और खाद्य प्रसंस्करण पर 2 प्रतिशत से भी कम निवेश किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने से कृषि क्षेत्र मजबूत नहीं बनता। जब तक फसलों के सुरक्षित भंडारण, प्रोसेसिंग, परिवहन और बाजार तक पहुंच की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक किसानों को पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा।
शोध में यह भी सामने आया कि चीन ज्यादातर उन परियोजनाओं को प्राथमिकता देता है जिन्हें जल्दी पूरा किया जा सके और जिनके सफल होने की संभावना अधिक हो। यानी निवेश का फैसला अफ्रीका की दीर्घकालिक कृषि जरूरतों के बजाय परियोजनाओं की व्यवहारिकता और चीन के रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अफ्रीका के कई देशों के पास सिंचाई, कृषि मशीनरी, वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग विकसित करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। ऐसे में विदेशी निवेश महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन यदि निवेश केवल उत्पादन तक सीमित रह जाए और मूल्य संवर्धन (Value Addition) से जुड़े क्षेत्रों को नजरअंदाज किया जाए, तो कृषि का स्थायी विकास संभव नहीं हो पाएगा।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि छोटे किसानों को स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने, कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देने और आधुनिक कृषि संस्थानों के विकास में चीन का निवेश अपेक्षाकृत बहुत कम है। यही वे क्षेत्र हैं जो किसी भी देश की कृषि अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक मजबूत बना सकते हैं। इसी वजह से कई विश्लेषक चीन की निवेश रणनीति को 'डेट ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज जाल कूटनीति) से जोड़कर देखते हैं। उनका तर्क है कि बड़े पैमाने पर दिए जाने वाले ऋण विकास के साथ-साथ चीन का रणनीतिक प्रभाव भी बढ़ाते हैं। हालांकि, इस दावे पर वैश्विक विशेषज्ञों की राय एक जैसी नहीं है।
कई शोधों में इसे चीन की भू-राजनीतिक रणनीति बताया गया है, जबकि अन्य अध्ययनों में कहा गया है कि सभी चीनी निवेशों को 'कर्ज जाल' कहना सही नहीं होगा और हर परियोजना का मूल्यांकन उसके अलग-अलग संदर्भ में किया जाना चाहिए। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि चीन का कृषि निवेश अफ्रीका में उत्पादन बढ़ाने में मदद कर रहा है, लेकिन खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, कोल्ड-चेन, बाजार व्यवस्था और छोटे किसानों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने जैसे अहम क्षेत्रों में निवेश की कमी भविष्य में कृषि विकास की सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।