Edited By Tanuja,Updated: 16 Sep, 2026 07:18 PM

ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की विशाल बर्फीली चादरों से 1979 के बाद करीब 12,500 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है। गर्म समुद्री पानी इसके पिघलने का बड़ा कारण है। इससे समुद्र का स्तर करीब 3.1 सेंटीमीटर बढ़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार बर्फ का नुकसान हर दशक के साथ...
Washington: धरती के दो सबसे बड़े बर्फीले किले अब तेजी से टूट रहे हैं और वैज्ञानिकों के नए आंकड़ों ने दुनिया के लिए खतरनाक चेतावनी जारी कर दी है। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की विशाल बर्फ की चादरों से महज 47 वर्षों में करीब 12,500 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है। अगर बर्फ पिघलने की यह रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही तो समुद्र का जलस्तर लगातार ऊपर उठ सकता है, जिससे दुनिया भर के तटीय इलाकों में बाढ़ और भारी तबाही का खतरा बढ़ सकता है। बुधवार को ‘साइंटिफिक डेटा’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन ने बर्फ पिघलने की भयावह तस्वीर सामने रखी है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, धरती के गर्म होने के साथ ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ की चादरें तेजी से सिकुड़ रही हैं। चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि पिघलने वाली बर्फ का करीब पांच-छठा हिस्सा गर्म हवा के बजाय गर्म समुद्री पानी की वजह से पिघल रहा है। गर्म पानी बर्फ की चादरों को नीचे और किनारों से काट रहा है। इसके चलते विशाल हिमनद टूटकर तेजी से समुद्र की ओर बह रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस प्रक्रिया का सीधा असर समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर पड़ रहा है और भविष्य में तटीय इलाकों के लिए खतरा और गंभीर हो सकता है।
12,500 अरब टन बर्फ बनी 30 लाख अरब गैलन पानी
1979 के बाद पिघली इस विशाल मात्रा की बर्फ से करीब 30 लाख अरब गैलन पानी बना। यह पानी समुद्र में पहुंचा और अध्ययन के अनुसार 1979 के बाद वैश्विक समुद्र स्तर में करीब 3.1 सेंटीमीटर, यानी लगभग एक इंच की बढ़ोतरी हुई। वैज्ञानिकों के मुताबिक, समुद्र के स्तर में एक इंच की वृद्धि सुनने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इसका असर बेहद व्यापक हो सकता है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका इनेस ओतोसाका ने कहा कि समुद्र के स्तर में हर एक सेंटीमीटर की बढ़ोतरी से साल में कम से कम एक बार बाढ़ की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या करीब 20 से 30 लाख बढ़ सकती है।
ग्रीनलैंड का जेकबशावन हिमनद भी तेजी से पीछे खिसक रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह हिमनद अब प्रतिदिन करीब 50 मीटर तक पीछे हट रहा है। हिमनदों के इस तेजी से पीछे हटने को ध्रुवीय क्षेत्रों में हो रहे बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका इनेस ओतोसाका के अनुसार, आंकड़ों में साफ दिखाई देता है कि बर्फ की चादरें हर दशक के साथ ज्यादा बर्फ खो रही हैं। खासकर समुद्र में बहने वाली बर्फ के नुकसान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और इसका संबंध जलवायु परिवर्तन से स्पष्ट रूप से जुड़ा दिखाई देता है।
27 उपग्रहों ने दिखाई संकट की तस्वीर
इस अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 45 स्वतंत्र सर्वेक्षणों और 27 अलग-अलग उपग्रहों से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया। पहले वैज्ञानिक मुख्य रूप से यूरोपीय उपग्रहों के आंकड़ों के आधार पर 1990 के दशक के बाद बर्फ की चादरों में हुए बदलावों का अध्ययन करते थे। नासा के उपग्रहों के आंकड़े भी शामिल किए जाने के बाद वैज्ञानिक अंटार्कटिका में 1979 और ग्रीनलैंड में 1972 तक बर्फ की मात्रा में हुए बदलावों का आकलन कर सके। अध्ययन के सह-लेखक और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन के हिम वैज्ञानिक एरिक रिग्नोट ने कहा कि ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ का नुकसान बढ़ रहा है और इसके साथ दुनिया भर में समुद्र का स्तर भी ऊपर जा रहा है। इससे तटीय इलाकों की असुरक्षा और बढ़ सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, सबसे चिंताजनक बात केवल यह नहीं है कि अरबों टन बर्फ पिघल चुकी है, बल्कि यह है कि बर्फ के नुकसान की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका धरती की विशाल प्राकृतिक बर्फीली ढाल हैं। इनके लगातार सिकुड़ने से समुद्र के स्तर में वृद्धि और तटीय इलाकों पर बाढ़ का खतरा आने वाले समय में और गंभीर हो सकता है।