पाकिस्तान में नया एंटी-टेरर कानून, गुप्त तरीके से हो सकेगी आतंकवाद मामलों की सुनवाई

Edited By Updated: 05 Sep, 2026 01:04 PM

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पाकिस्तान के सबसे ज़्यादा आबादी वाले प्रांत, पंजाब में नेताओं ने एक ऐसा कानून पास किया है जिसके तहत आतंकवाद के मुकदमों की सुनवाई लगभग पूरी तरह से गुप्त तरीके से हो सकती है। इसमें जज, सरकारी वकील और गवाहों की पहचान गुप्त रखी जा सकती है।

पंजाब प्रांतः पाकिस्तान के सबसे ज़्यादा आबादी वाले प्रांत, पंजाब में नेताओं ने एक ऐसा कानून पास किया है जिसके तहत आतंकवाद के मुकदमों की सुनवाई लगभग पूरी तरह से गुप्त तरीके से हो सकती है। इसमें जज, सरकारी वकील और गवाहों की पहचान गुप्त रखी जा सकती है।

इस कानून के तहत, देश के सबसे गंभीर आपराधिक आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति को यह जाने बिना दोषी ठहराया जा सकता है कि उनके खिलाफ़ मामला किसने सुना, किसने मुकदमा चलाया या किसने गवाही दी। मुकदमे के रिकॉर्ड को सील किया जा सकता है, और अपील की सुनवाई ऐसे जजों द्वारा की जा सकती है जिन्हें कभी यह नहीं बताया गया कि मूल मुकदमे की अध्यक्षता किसने की थी।

विपक्ष के नेताओं के विरोध में सदन से बाहर चले जाने के बाद, 31 अगस्त को पंजाब असेंबली में 'एंटी-टेररिज्म (पंजाब अमेंडमेंट) बिल 2026' पास हुआ। चार दिन पहले, सरकार नरम पड़ती दिखी थी और कानून विभाग या संसदीय समिति से बिल की समीक्षा कराने पर सहमत हो गई थी। जब यह बिल दोबारा सदन में आया, तो इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया था और सोमवार को इसे बिना किसी संशोधन के पास कर दिया गया।

इस कानून की विपक्ष के नेताओं, वकीलों, मानवाधिकार समूहों और विश्लेषकों ने आलोचना की है। उनका कहना है कि यह कानून एक ही, बिना नाम वाले अधिकारी को बहुत ज़्यादा ताकत देता है और इसका इस्तेमाल सरकार की आलोचना करने वालों के खिलाफ़ किया जा सकता है।

नया कानून क्या करता है?
यह कानून सरकार को एक वरिष्ठ नौकरशाह को "नामित अधिकारी" (designated authority) के तौर पर नियुक्त करने की इजाज़त देता है। इस अधिकारी का काम यह तय करना है कि कानून में बताए गए खास प्रावधानों के तहत किन मामलों की सुनवाई होगी। अधिकारी की पहचान गुप्त रखी जाती है और इसके बारे में सिर्फ़ लाहौर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पता होता है। अगर अधिकारी को लगता है कि इसमें शामिल लोगों को खास "सुरक्षा" की ज़रूरत है, तो वह किसी भी आतंकवाद के मामले, या मामलों की पूरी श्रेणी को "विशेष सुरक्षा मामला" घोषित कर सकता है।

कानून में उन पैमानों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है जिन्हें पूरा करना ज़रूरी है, और आरोपी इस श्रेणी में रखे जाने का विरोध नहीं कर सकता। एक बार जब अधिकारी अनुरोध करता है, तो मुख्य न्यायाधीश मामले को एंटी-टेररिज्म कोर्ट के मौजूदा जज को सौंप देते हैं। सरकारी वकीलों का पांच लोगों का एक पैनल बनाया जाता है, और अधिकारी उनमें से किसी एक को चुनता है।

इसके बाद, किसी भी स्थिति में जज, सरकारी वकील, पुलिस अधिकारियों, गवाहों और बचाव पक्ष के वकीलों की पहचान उजागर नहीं की जा सकती। नामों के बजाय आधिकारिक पदनामों का इस्तेमाल किया जाता है, और कोर्ट के आदेशों पर बिना यह बताए हस्ताक्षर किए जाते हैं कि किसने हस्ताक्षर किए हैं।

गवाहों की पहचान सिर्फ़ कोड से की जाती है। सुनवाई वीडियो-लिंक के ज़रिए हो सकती है, जिसमें जेल के अंदर से भी सुनवाई शामिल है, और इसमें शामिल लोगों की आवाज़ छिपाने के लिए आवाज़ बदलने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। केस फ़ाइल को सील करके मुख्य न्यायाधीश और संबंधित अधिकारी के पास संयुक्त रूप से रखा जाता है।

इस कानून में कोई समय-सीमा (एक्सपायरी डेट) तय नहीं है, और इसमें एक आखिरी क्लॉज़ सरकार को "ऐसे अन्य उपाय करने की अनुमति देता है जिन्हें वह उचित समझे"। इससे बिना किसी नए कानून के और अधिकार जोड़ने की गुंजाइश बनी रहती है।

सरकार ऐसा क्यों कर रही है?
बिल में सरकार की आधिकारिक दलील यह है कि हथियारबंद समूहों के हमलों के मामले बढ़े हैं और जजों, सरकारी वकीलों, जांचकर्ताओं और गवाहों को ज़्यादा खतरों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा कानून उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता है।

विधानसभा में स्पीकर मलिक मुहम्मद अहमद खान ने पिछले दो दशकों में आतंकवाद के कारण पाकिस्तान को हुए नुकसान का ज़िक्र करते हुए कहा कि मुकदमों को मज़बूत करने के लिए विधानसभा ही सही मंच है। बिल पेश करने वाले विधायक खालिद महमूद रंझा ने अल जज़ीरा को बताया कि ट्रायल जज को नामित करने का काम मुख्य न्यायाधीश करते हैं, न कि कोई तय अधिकारी। उन्होंने कहा, "इसमें कार्यपालिका का कोई दखल नहीं है।" उन्होंने इस आशंका को खारिज कर दिया कि इस कानून का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किया जा सकता है। नेता ने कहा, "यह सिर्फ़ एक आशंका है।" उन्होंने आलोचना को "कानून का राजनीतिकरण करने और उसे विवादित बनाने का प्रोपेगैंडा" बताया।

"यह कानून सिर्फ़ कट्टर आतंकवादियों के लिए है।" लेकिन किसी खास हमले या मामले को इसकी वजह के तौर पर सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया है। पंजाब में हर साल आतंकवाद से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी पाकिस्तान के कुल आंकड़ों का बहुत छोटा हिस्सा है। ज़्यादातर मौतें खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में होती हैं, जहाँ देश में आतंकवाद से होने वाली कुल मौतों का 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा होता है। अल जज़ीरा ने पंजाब की सूचना मंत्री अज़मा बुखारी, पंजाब सरकार की वरिष्ठ मंत्री मरियम औरंगज़ेब और पंजाब के कानून मंत्री राणा मुहम्मद इक़बाल से संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

लाहौर की संवैधानिक वकील रिदा हुसैन ने कहा कि पाकिस्तान में जजों, सरकारी वकीलों और गवाहों को जो खतरे हैं, वे वास्तविक हैं। उन्होंने अल जज़ीरा से कहा, "इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आतंकवाद की भारी कीमत पाकिस्तान के लोगों और ज़मीन को चुकानी पड़ी है।" लेकिन उन्होंने कहा कि जिस किसी ने भी संशोधन को वास्तव में पढ़ा है, वह "यह दावा नहीं कर सकता कि यह उचित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप है"। विपक्षी नेताओं ने तर्क दिया कि यह कानून निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है और बिना किसी निगरानी के एक ऐसे अधिकारी को न्यायिक शक्तियां देता है जिसे चुना नहीं गया है।

जेल में बंद विपक्षी नेता इमरान खान की पार्टी 'पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ' (PTI) से जुड़े निर्दलीय विधायक अहमेर रशीद भट्टी ने सदन में इस कानून का विरोध किया। उन्होंने कहा, "यह एक समानांतर प्रक्रिया बनाता है जिसमें अदालत के बजाय कार्यपालिका यह तय करती है कि निष्पक्ष सुनवाई कैसी होगी।"


 

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