Edited By Ramanjot,Updated: 30 Mar, 2026 12:09 PM

मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने शिक्षा व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। लेबनान सहित कई क्षेत्रों में लाखों छात्र स्कूलों से दूर हो गए हैं, जबकि कई स्कूल शरणस्थल में बदल गए हैं।
इंटरनेशनल डेस्क: मध्य पूर्व में जारी भीषण संघर्ष अब केवल सैन्य मोर्चों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने नई पीढ़ी के भविष्य पर भी गहरा प्रहार किया है। लेबनान, ईरान और इजरायल में छिड़ी इस जंग ने शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह चरमरा दिया है। जिन स्कूल परिसरों में कभी किताबों की खुशबू और बच्चों का शोर गूंजता था, वे आज मलबे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं या विस्थापित परिवारों के लिए अस्थायी शरणस्थली बन गए हैं।
शिक्षा के मंदिर बने आश्रय स्थल
आंकड़ों के अनुसार, लेबनान में लगभग 5,00,000 छात्र स्कूलों से दूर हो चुके हैं। बमबारी के डर से शैक्षणिक संस्थान बंद हैं और जो सुरक्षित बचे हैं, उनका उपयोग युद्ध की विभीषिका झेल रहे लोगों को ठहराने के लिए किया जा रहा है।
अहमद: संघर्ष और सपनों की एक बानगी
बेरुत के दक्षिणी उपनगर से विस्थापित हुए छात्र अहमद मल्हम की कहानी इस संकट की एक जीती-जागती तस्वीर है। अहमद अब एक स्कूल के क्लासरूम में रहते हैं, जिसे प्लास्टिक के पर्दों की मदद से रसोई और बेडरूम में बदल दिया गया है। भविष्य में इंजीनियर बनने का सपना देखने वाले अहमद के लिए पढ़ाई अब एक संघर्ष बन चुकी है। शोर-शराबे के बीच बिना इंटरनेट के टैबलेट पर रिकॉर्डेड लेक्चर देखना उनके लिए लगभग असंभव होता जा रहा है।