Edited By Mansa Devi,Updated: 20 Mar, 2026 11:18 AM

दुनियाभर में कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच वैज्ञानिकों ने एक अहम खोज की है, जो आंत (गट) में रहने वाले बैक्टीरिया और कोलन कैंसर के बीच संबंध को और स्पष्ट करती है।
नेशनल डेस्क: दुनियाभर में कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच वैज्ञानिकों ने एक अहम खोज की है, जो आंत में रहने वाले बैक्टीरिया और कोलन कैंसर के बीच संबंध को और स्पष्ट करती है। अमेरिका के शोधकर्ताओं द्वारा की गई यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल Science में प्रकाशित हुई है। इस शोध में पहली बार विस्तार से बताया गया है कि आंत में मौजूद कुछ बैक्टीरिया हमारे डीएनए को किस तरह नुकसान पहुंचाकर कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं।
बैक्टीरिया और टॉक्सिन का संबंध
हमारी आंत में कई तरह के बैक्टीरिया रहते हैं, जिन्हें मिलाकर “गट माइक्रोबायोम” कहा जाता है। इनमें से कुछ बैक्टीरिया हमारे पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद होते हैं। लेकिन कुछ खास प्रकार के E. coli बैक्टीरिया एक जहरीला पदार्थ (टॉक्सिन) बनाते हैं, जिसे कोलिबैक्टिन (Colibactin) कहा जाता है।
सामान्य स्थिति में ये बैक्टीरिया नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही टॉक्सिन शरीर के लिए खतरनाक बन सकता है। वैज्ञानिकों को पहले से अंदाजा था कि कोलिबैक्टिन डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है और इसका संबंध कोलोरेक्टल कैंसर से हो सकता है, लेकिन इसे विस्तार से समझना मुश्किल था क्योंकि यह टॉक्सिन बहुत जल्दी टूट जाता है।
नई स्टडी में क्या पता चला?
इस नए शोध में वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीकों जैसे मास स्पेक्ट्रोमेट्री और न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस (NMR) का इस्तेमाल किया। इन तकनीकों की मदद से उन्होंने कोलिबैक्टिन के काम करने के तरीके को गहराई से समझा। रिसर्च में सामने आया कि यह टॉक्सिन डीएनए को किसी भी जगह नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि खास हिस्सों को निशाना बनाता है। यह डीएनए के उन भागों पर असर करता है, जहां एडेनिन (A) और थाइमिन (T) की मात्रा अधिक होती है।
कोलिबैक्टिन डीएनए की दोनों स्ट्रैंड्स को आपस में जोड़ देता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में “इंटरस्ट्रैंड क्रॉस-लिंक” कहा जाता है। इससे डीएनए सही तरीके से कॉपी (रिप्लिकेट) या खुद की मरम्मत (रिपेयर) नहीं कर पाता। यही गड़बड़ी आगे चलकर कैंसर का कारण बन सकती है।
यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?
शोध में यह भी पाया गया कि यह टॉक्सिन डीएनए के एक खास हिस्से, जिसे माइनर ग्रूव कहा जाता है, में जाकर चिपकता है। इसकी बनावट ऐसी होती है कि यह बिल्कुल सही जगह पर फिट हो जाता है ठीक “लॉक और की” (ताला-चाबी) की तरह। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि कोलोरेक्टल कैंसर के कई मरीजों में एक जैसे डीएनए बदलाव क्यों देखने को मिलते हैं। यह जानकारी भविष्य में कैंसर की बेहतर पहचान और इलाज के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस खोज के आधार पर आने वाले समय में:
- ऐसे टेस्ट विकसित किए जा सकते हैं, जो आंत में मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया की पहचान कर सकें
- नई दवाएं बनाई जा सकती हैं, जो कोलिबैक्टिन बनने से रोकें या उसके असर को खत्म करें
- डाइट और प्रोबायोटिक्स के जरिए गट माइक्रोबायोम को संतुलित करने के तरीके विकसित किए जा सकते हैं