यमराज के दूतों को करेंगे प्रसन्न तभी मिलेगा श्राद्ध करने का फल

Edited By Updated: 05 Oct, 2015 10:49 AM

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मनुष्य मृत्यु के बाद अपने कर्म से जिस भी योनि में जाता है उसे श्राद्ध अन्न उसी योनि के आहार के रूप में प्राप्त होता है। श्राद्धकर्म में अधिक से अधिक तीन ब्राह्मण पर्याप्त माने गए हैं।

मनुष्य मृत्यु के बाद अपने कर्म से जिस भी योनि में जाता है उसे श्राद्ध अन्न उसी योनि के आहार के रूप में प्राप्त होता है। श्राद्धकर्म में अधिक से अधिक तीन ब्राह्मण पर्याप्त माने गए हैं। श्राद्ध के लिए बने पकवान तैयार होने पर एक थाली में पांच जगह थोड़े-थोड़े सभी पकवान परोसकर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन, तिल ले कर पंचबलि (गो, श्वान, काक, देव, पिपीलिका) के लिए संकल्प करना चाहिए।

पंचबलि निकालकर कौआ के निमित्त निकाला गया अन्न कौआ को, कुत्ते का अन्न कुत्ते को तथा अन्य सभी अन्न गाय को देना चाहिए। तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। ब्राह्मण को भोजन पश्चात अन्न, वस्त्र, ताम्बूल (पान का बीड़ा) एवं दक्षिणा आदि देकर तिलक कर चरण स्पर्श करना चाहिए।
 
धर्म शास्त्रों में लिखा है कि पिंड रूप में कौओं को भी भोजन कराना चाहिए। ब्रह्मा जी ने सत्व, रज और तमोगुण के मिश्रण के साथ सृष्टि का निर्माण किया। पक्षियों में कौआ तमोगुण से युक्त है। पुराणों में कौओं को यम का पक्षी माना गया है। इसकी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होती अर्थात यह दीर्घजीवी है। कौआ मनुष्य में दादा से पड़पोता तक की चार आयु को जी लेता है।   
 
विभिन्न शास्त्रों में कौए को यमराज का दूत भी कहा गया है। ऐसी लोकमान्यता है कि कौआ यमलोक में जाकर पृथ्वीवासियों के विषय में चित्रगुप्तजी को सूचित करता है। अर्थात कौआ ही व्यक्ति के लेखे-जोखे का हिसाब रखता है।
 
जहां गौ माता हो, यदि ऐसे स्थान पर कोई भी व्रत, जप, साधना, श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, नियम, उपवास या तप किया जाता है तो वह अनंत फलदायी होकर अक्षय फल देने वाला हो जाता है इसलिए श्राद्ध करते समय गौ माता का भाग अवश्य निकाले और कुत्ते को भी भोजन अवश्य करवाएं क्योंकि इसे यमराज का पशु माना गया है, श्राद्ध का एक अंश इनृको देने से यमराज प्रसन्न होते हैं हो सके तो काले कुत्ते को ही भोजन करवाएं।

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