Edited By Rohini Oberoi,Updated: 15 Mar, 2026 02:48 PM

भारत में बढ़ता मोटापा और बदलती जीवनशैली अब गर्भवती महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 25% गर्भवती महिलाएं 'जेस्टेशनल डायबिटीज' (Gestational Diabetes) की शिकार हो रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल मां...
Gestational Diabetes Risks and Prevention : भारत में बढ़ता मोटापा और बदलती जीवनशैली अब गर्भवती महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 25% गर्भवती महिलाएं 'जेस्टेशनल डायबिटीज' (Gestational Diabetes) की शिकार हो रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल मां की बीमारी नहीं है बल्कि यह गर्भ में पल रहे बच्चे की प्रोग्रामिंग को बदल सकती है।
क्या है प्रेग्नेंसी डायबिटीज?
यह वह स्थिति है जब किसी महिला को पहले से शुगर नहीं होती लेकिन गर्भावस्था के 24 से 28 सप्ताह के बीच शरीर में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है। गर्भावस्था के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव इंसुलिन के असर को कम कर देते हैं। यदि शरीर का पैंक्रियाज (अग्नाशय) पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता तो शुगर लेवल बढ़ जाता है। इसके लक्षण अक्सर दिखाई नहीं देते इसलिए नियमित जांच ही एकमात्र रास्ता है।
बच्चे पर पड़ने वाले गंभीर असर
जब मां का शुगर लेवल बढ़ता है तो प्लेसेंटा के जरिए अतिरिक्त ग्लूकोज बच्चे तक पहुंचता है। इससे बच्चे का पैंक्रियाज भी ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है जिसके परिणाम स्वरूप बच्चे के ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (Attention) और व्यवहार पर असर पड़ सकता है। मोटर स्किल्स में देरी या मिर्गी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। बच्चे का वजन जरूरत से ज्यादा बढ़ना और जन्म के तुरंत बाद बच्चे की शुगर अचानक गिर जाना (हाइपोग्लाइसीमिया) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
फीटल प्रोग्रामिंग: भविष्य का खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार गर्भ में हाई शुगर का वातावरण बच्चे के मेटाबॉलिज्म को हमेशा के लिए प्रभावित कर सकता है। ऐसे बच्चों में बड़े होकर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस होने की संभावना काफी ज्यादा होती है।
भारत में क्यों बढ़ रहे हैं मामले?
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देर से कंसीव करना: अधिक उम्र में मां बनना।
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जेनेटिक्स: भारतीयों में डायबिटीज के प्रति आनुवंशिक संवेदनशीलता।
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लाइफस्टाइल: शारीरिक गतिविधि की कमी और जंक फूड का अधिक सेवन।
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प्री-डायबिटीज: प्रेग्नेंसी से पहले ही बॉर्डरलाइन शुगर का होना।
बचाव और नियंत्रण के तरीके
डॉक्टरों का मानना है कि सही अनुशासन से इस खतरे को टाला जा सकता है:
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डाइट: रिफाइंड शुगर और मैदा छोड़ें, फाइबर युक्त भोजन (जैसे फल, हरी सब्जियां) ज्यादा लें।
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एक्टिव रहें: डॉक्टर की सलाह पर रोजाना 20-30 मिनट पैदल चलें।
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मॉनिटरिंग: नियमित रूप से ब्लड शुगर लेवल चेक करवाते रहें।
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इलाज: जरूरत पड़ने पर इंसुलिन थेरेपी लें जो प्रेग्नेंसी में पूरी तरह सुरक्षित है।