Edited By Mehak,Updated: 05 Apr, 2026 11:08 AM

असम में कांग्रेस की सत्ता में वापसी काफी हद तक 23 मुस्लिम बहुल सीटों पर निर्भर मानी जा रही है। परिसीमन के बाद इन सीटों की संख्या कम हुई है और इस बार कांग्रेस व एआईयूडीएफ के बीच सीधा मुकाबला है। मुस्लिम वोटों पर कांग्रेस की मजबूत पकड़ दिख रही है,...
नेशनल डेस्क : असम में कांग्रेस करीब एक दशक बाद फिर से सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है। इस बार उसकी राह काफी हद तक मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों के प्रदर्शन पर निर्भर मानी जा रही है। पहले जहां ऐसी सीटों की संख्या अधिक थी, वहीं परिसीमन (delimitation) के बाद अब इनकी संख्या घटकर 23 रह गई है। ऐसे में हर सीट का महत्व और बढ़ गया है।
2021 में गठबंधन का असर
पिछले विधानसभा चुनाव (2021) में कांग्रेस और एआईयूडीएफ (AIUDF) ने गठबंधन किया था। उस समय मुस्लिम बहुल कुल 31 सीटें थीं और गठबंधन इन सभी सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रहा था। यह कांग्रेस के लिए बड़ी राजनीतिक मजबूती का संकेत था। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। अब कांग्रेस और AIUDF अलग-अलग चुनाव मैदान में हैं, जिससे इन सीटों पर सीधा मुकाबला देखने को मिल रहा है।
सीटों की संख्या घटी, मुकाबला बढ़ा
परिसीमन के बाद मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या घटकर 23 रह गई है। ऐसे में कांग्रेस के लिए चुनौती और बढ़ गई है, क्योंकि यदि इन सीटों पर उसे नुकसान होता है तो सत्ता में वापसी की उसकी उम्मीदों को झटका लग सकता है।
मुस्लिम वोटर और कांग्रेस का समीकरण
राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को सीधी चुनौती देने की वजह से कांग्रेस अभी भी मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद मानी जा रही है। कई जगहों पर मुस्लिम समुदाय के लोग खुलकर इस बात को स्वीकार भी करते हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिला। धुबरी सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार को भारी वोट मिले, जबकि AIUDF के प्रमुख को अपेक्षाकृत काफी कम समर्थन मिला। यह संकेत देता है कि मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर झुक सकता है।
AIUDF की चुनौती और रणनीति
एआईयूडीएफ, जो पहले मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूत स्थिति में रहती थी, अब अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। 2011 और 2016 के चुनावों में पार्टी ने अच्छी संख्या में सीटें जीती थीं, लेकिन हाल के चुनावों में उसका प्रदर्शन कमजोर रहा है। इस बार पार्टी ने मुस्लिम वोटों को फिर से अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। इसके लिए उसने अन्य राज्यों के प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं को भी प्रचार में शामिल किया है।
कांग्रेस बनाम AIUDF
इस चुनाव में खास बात यह है कि एआईयूडीएफ का फोकस भाजपा के बजाय कांग्रेस पर अधिक दिखाई दे रहा है। पार्टी कांग्रेस पर आरोप लगाकर मुस्लिम मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि कांग्रेस भरोसेमंद नहीं रही है। वहीं कांग्रेस का प्रयास है कि वह मुस्लिम वोटों को अपने साथ बनाए रखते हुए भाजपा विरोधी मतों को एकजुट करे।
भाजपा की रणनीति और असर
राज्य की सत्ताधारी भाजपा भी इस समीकरण को प्रभावित करने में जुटी है। भाजपा नेतृत्व लगातार कांग्रेस को मुस्लिम समर्थक पार्टी बताकर हिंदू वोटों को एकजुट करने की रणनीति अपना रहा है। इसका असर यह हो सकता है कि चुनाव में ध्रुवीकरण बढ़े और दोनों पक्ष अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने में लगे रहें।