Edited By Rohini Oberoi,Updated: 13 Mar, 2026 10:11 AM

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों ने स्टेम सेल थेरेपी (Stem Cell Therapy) के जरिए चिकित्सा जगत में इतिहास रच दिया है। अस्पताल के विशेष ट्रायल में अम्बिलिकल कॉर्ड (गर्भनाल) के स्टेम सेल का उपयोग कर उन महिलाओं के क्षतिग्रस्त गर्भाशय को रिपेयर...
Stem Cell Therapy for Infertility : दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों ने स्टेम सेल थेरेपी (Stem Cell Therapy) के जरिए चिकित्सा जगत में इतिहास रच दिया है। अस्पताल के विशेष ट्रायल में अम्बिलिकल कॉर्ड (गर्भनाल) के स्टेम सेल का उपयोग कर उन महिलाओं के क्षतिग्रस्त गर्भाशय को रिपेयर किया गया है जिन्हें 'एशरमैन सिंड्रोम' जैसी गंभीर समस्या थी। इस ट्रायल में शामिल 10 में से 2 महिलाएं स्वस्थ बच्चों को जन्म दे चुकी हैं।
क्या है 'एशरमैन सिंड्रोम' और क्यों होती है यह समस्या?
आईवीएफ विभाग की डायरेक्टर डॉ. आभा मजूमदार के अनुसार कई बार गर्भपात (Abortion) या गंभीर संक्रमण के कारण गर्भाशय की आंतरिक परत (Inner lining) आपस में चिपक जाती है। चूंकि अबॉर्शन एक 'ब्लाइंड प्रोसीजर' है इसलिए सफाई के दौरान कभी-कभी गर्भाशय की परत ज्यादा छिल जाती है। इसके बाद गर्भाशय खुद को रिपेयर नहीं कर पाता जिससे पीरियड्स बंद हो जाते हैं और गर्भधारण करना नामुमकिन हो जाता है। इसी स्थिति को 'एशरमैन सिंड्रोम' कहते हैं।
कैसे काम करती है यह नई तकनीक?
अस्पताल के आईवीएफ और बायोटेक्नोलॉजी विभाग ने मिलकर इस पर रिसर्च की:
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गर्भनाल का चयन: सिजेरियन डिलीवरी के दौरान मां की अनुमति से गर्भनाल (Umbilical Cord) ली गई।
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स्टेम सेल का विकास: इसके 'मेसेनकाइमल स्टेम सेल' (UC-MSCs) किसी भी अंग के सेल की तरह विकसित होने की क्षमता रखते हैं।
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प्रक्रिया: इन सेल्स को लैब में तैयार कर वैजिनल रास्ते से महिलाओं के गर्भाशय में इंजेक्ट किया गया।
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परिणाम: महज 5 से 6 महीने में इसका असर दिखा। 4 साल से बंद पीरियड्स दोबारा शुरू हो गए और गर्भाशय की परत फिर से जीवित हो उठी।
सफलता की दो बड़ी कहानियां (Case Studies)
केस स्टडी 1: एक 39 वर्षीय महिला के गर्भाशय की परत गर्भपात के बाद चिपक गई थी। स्टेम सेल थेरेपी के बाद उनकी एंडोमेट्रियल मोटाई में सुधार हुआ और आईवीएफ (IVF) के जरिए उन्होंने 35 सप्ताह में एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।
केस स्टडी 2: 40 वर्षीय महिला जो बार-बार होने वाले गर्भपात और गंभीर संक्रमण से जूझ रही थीं। इस थेरेपी के बाद उनका गर्भाशय रिपेयर हुआ और उन्होंने 31 सप्ताह में एक नन्ही बच्ची को जन्म दिया। दोनों ही मामलों में बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हैं।