Edited By Mehak,Updated: 21 Mar, 2026 11:55 AM
सोने की कीमतों में हाल ही में गिरावट देखने को मिली है, जिससे खरीदारों के लिए राहत की उम्मीद बढ़ी है। मजबूत डॉलर, बढ़ती महंगाई और ऊंची ब्याज दरों के दबाव के कारण सोने पर असर पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो सोने के दाम और...
नेशनल डेस्क : हाल के समय में सोने की कीमतों में काफी अस्थिरता देखने को मिली है, जिसने निवेशकों और आम खरीदारों दोनों को प्रभावित किया है। जहां एक ओर भू-राजनीतिक तनाव के चलते सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर मौद्रिक नीतियों और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों ने इसकी कीमतों पर दबाव बना दिया है। खासतौर पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने सोने की चाल को कमजोर किया है। यही कारण है कि पिछले सप्ताह सोने के दामों में गिरावट दर्ज की गई, जिससे बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
पिछले सप्ताह का प्रदर्शन और प्रमुख स्तर
पिछले हफ्ते घरेलू वायदा बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट देखने को मिली और यह करीब 1,44,825 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले अंतरराष्ट्रीय तनाव के दौरान सोना लगभग 1,60,000 रुपये के आसपास पहुंच गया था, लेकिन ऊंचे स्तर पर टिक नहीं पाया। वहीं वैश्विक बाजार में भी सोने की कीमतें दबाव में रहीं और यह करीब 4,574 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस पर बंद हुआ। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि केवल भू-राजनीतिक तनाव ही कीमतों को ऊपर नहीं ले जा पा रहा, बल्कि अन्य आर्थिक कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
मजबूत डॉलर और ब्याज दरों का दबाव
सोने की कीमतों में गिरावट का सबसे बड़ा कारण अमेरिकी डॉलर की मजबूती मानी जा रही है। जब डॉलर मजबूत होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना महंगा पड़ता है, जिससे इसकी मांग घटती है। इसके अलावा, अमेरिका में महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरें ऊंची बनाए रखने की संभावना भी सोने के लिए नकारात्मक संकेत है। ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक फिक्स्ड इनकम जैसे विकल्पों की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे सोने में निवेश घटता है और कीमतों पर दबाव आता है।
कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई का प्रभाव
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। तेल महंगा होने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ती है, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव बनता है। इस स्थिति में केंद्रीय बैंक सख्त नीतियां अपनाते हैं, जैसे ब्याज दरें बढ़ाना या लंबे समय तक ऊंची रखना। इससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ता है और सोने की मांग भी कमजोर हो जाती है। यानी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी अप्रत्यक्ष रूप से सोने को प्रभावित कर रही है।
भू-राजनीतिक तनाव: असर सीमित क्यों?
आमतौर पर युद्ध या तनाव की स्थिति में सोना सुरक्षित निवेश के रूप में तेजी दिखाता है, लेकिन इस बार इसका असर सीमित रहा है। पश्चिम एशिया में टकराव और ऊर्जा ढांचे पर हमलों ने जरूर बाजार में चिंता बढ़ाई है, लेकिन साथ ही महंगाई और ब्याज दरों का दबाव इतना ज्यादा है कि सोने की कीमतें ज्यादा ऊपर नहीं जा पा रही हैं। यानी इस समय बाजार दो विपरीत ताकतों के बीच फंसा हुआ है—एक तरफ सुरक्षा की मांग और दूसरी तरफ आर्थिक सख्ती।
निवेशकों की रणनीति और मुनाफावसूली
जब सोने की कीमतें तेजी से बढ़कर ऊंचे स्तर पर पहुंचती हैं, तो कई निवेशक मुनाफा कमाने के लिए अपनी होल्डिंग बेच देते हैं। इससे बाजार में सप्लाई बढ़ जाती है और कीमतों में गिरावट आ जाती है। हाल के दिनों में भी यही देखने को मिला, जब ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बाद सोने में बिकवाली बढ़ी और कीमतें नीचे आ गईं। यह एक सामान्य बाजार व्यवहार है, जो कीमतों को संतुलित करता है।
मांग में कमी: भारत और चीन का असर
भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल हैं। जब सोने की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो इन देशों में आम लोगों की खरीदारी कम हो जाती है। इससे कुल मांग घटती है और कीमतों पर दबाव पड़ता है। वर्तमान स्थिति में भी ऊंची कीमतों के कारण मांग में कमी देखी जा रही है, जो गिरावट का एक अहम कारण है।
आगे का अनुमान: कितना गिर सकता है सोना?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। अगर मौजूदा हालात बने रहते हैं, तो सोना निकट भविष्य में 1,40,000 से 1,47,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच कारोबार कर सकता है। वहीं अगर दबाव और बढ़ता है, तो कीमतें गिरकर 1,35,000 या यहां तक कि 1,27,000 रुपये तक भी जा सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोना कमजोर होकर करीब 4,250 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है।