Edited By Pardeep,Updated: 05 Jun, 2026 11:55 PM

राजधानी दिल्ली के किदवई नगर में इन दिनों एक ऐसा स्कूल चर्चा का विषय बना हुआ है जहां न तो भारी-भरकम फीस है और न ही चारदीवारी के भीतर क्लासरूम।
नेशनल डेस्कः राजधानी दिल्ली के किदवई नगर में इन दिनों एक ऐसा स्कूल चर्चा का विषय बना हुआ है जहां न तो भारी-भरकम फीस है और न ही चारदीवारी के भीतर क्लासरूम। भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के अधिकारी रोहित मेहरा और उनकी पत्नी गीतांजलि ने 'स्कूल ऑफ ट्रीज' (School of Trees) की शुरुआत की है, जहां कुदरत ही शिक्षक है और पेड़ ही पाठशाला।
एबीसीडी का बदला अंदाज
रोहित मेहरा ने बच्चों को पढ़ाने के लिए एक खास 'जीवित' वर्णमाला (Alphabet chart) तैयार की है। यहां बच्चे 'ए' फॉर एप्पल नहीं बल्कि 'ए' फॉर एफोरेस्टेशन (वनीकरण), 'बी' फॉर बैम्बू (बांस) और 'ई' फॉर अर्थ (पृथ्वी) सीख रहे हैं। मेहरा का मानना है कि आज के बच्चे कारों के ब्रांड और फिल्मों को तो जानते हैं लेकिन पेड़ों से उनका भावनात्मक जुड़ाव कम हो रहा है जिसे बदलना जरूरी है।
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खेल-खेल में पर्यावरण का पाठ
ट्री पार्टी: हर वीकेंड पर करीब 45 बच्चे 'ट्री पार्टी' के लिए जुटते हैं, जहां वे मिट्टी छूना और बीज के गोले (seed balls) बनाना सीखते हैं।
सीखने की कोई उम्र नहीं: 7 से 17 साल के बच्चे यहां पेड़ों की छालों को छूकर और पत्तियों की बनावट को देखकर विज्ञान के कड़े सिद्धांतों जैसे 'फोटोसिंथेसिस' को आसानी से समझ रहे हैं।
प्रकृति प्रेम से शुरू हुई एक नई सोच
रोहित मेहरा और उनकी पत्नी पिछले 10–12 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली (सस्टेनेबल लिविंग) को अपने जीवन का हिस्सा बनाए हुए हैं। वे घर में प्लास्टिक की पुरानी बोतलों से वर्टिकल गार्डन बनाते हैं, पौधे लगाते हैं और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करते हैं।
साल 2021 में उन्होंने अमृतसर में देश का पहला ‘ट्री हॉस्पिटल’ भी शुरू किया था, जहां बीमार और क्षतिग्रस्त पेड़ों का उपचार किया जाता है। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि आज के शहरों में रहने वाले बच्चे प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं।
रोहित कहते हैं कि आज के बच्चे कारों के ब्रांड, मोबाइल गेम और फिल्मों के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन अपने आसपास के पेड़ों और पौधों के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। उन्हें लगा कि बच्चों के मन में प्रकृति के प्रति जिज्ञासा और लगाव पैदा करना जरूरी है। इसी सोच से वर्ष 2025 में ‘स्कूल ऑफ ट्रीज़’ की शुरुआत हुई।
खेल-खेल में सीखते हैं बच्चे
स्कूल ऑफ ट्रीज़ में पढ़ाई को मजेदार बनाने के लिए कई गतिविधियां कराई जाती हैं।
1. ट्री ऑब्जर्वेशन गेम
बच्चों को एक मिनट का समय दिया जाता है जिसमें उन्हें आसपास दिखने वाले पेड़ों के नाम बताने होते हैं। विजेता को चॉकलेट मिलती है, लेकिन केवल सीमित मात्रा में। इससे बच्चों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता के साथ-साथ संयम और संतुलन की भावना भी विकसित होती है।
2. बीज बोने और पौधे उगाने की गतिविधि
बच्चों को गमले और बीज दिए जाते हैं। वे घर जाकर पौधे उगाते हैं, उनकी देखभाल करते हैं और बाद में अपने अनुभव साझा करते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।
3. सीड बॉल बनाना
बच्चे मिट्टी और बीजों से सीड बॉल तैयार करते हैं जिन्हें बाद में खाली स्थानों पर फेंका जाता है ताकि वहां नए पौधे उग सकें।
घर-घर तक पहुंच रहा है संदेश
स्कूल ऑफ ट्रीज़ का प्रभाव केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। बच्चे अपने घरों में भी पर्यावरण संरक्षण के छोटे-छोटे उपाय अपनाने लगे हैं। कई परिवार प्लास्टिक की बोतलों का पुनः उपयोग कर रहे हैं।
- घर में पौधे लगा रहे हैं।
- जैविक कचरे से खाद (कम्पोस्ट) बना रहे हैं।
- पानी और संसाधनों की बचत पर ध्यान दे रहे हैं।
इस प्रकार बच्चे अपने माता-पिता और समुदाय को भी प्रेरित कर रहे हैं।