IVF में बड़ी लापरवाही... जुड़वां बच्चों का माता-पिता से नहीं मिला DNA

Edited By Updated: 15 Jun, 2026 09:42 PM

dna of twins born via ivf did not match their parents

दिल्ली के एक दंपति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया है कि कृत्रिम रूप से भ्रूण तैयार करने की प्रक्रिया (आईवीएफ) के तहत पैदा हुए उनके जुड़वां बच्चों का डीएनए कथित तौर पर माता-पिता में से किसी से भी मेल नहीं खाया है। इस खुलासे ने संबंधित अस्पताल...

नेशनल डेस्क : दिल्ली के एक दंपति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया है कि कृत्रिम रूप से भ्रूण तैयार करने की प्रक्रिया (आईवीएफ) के तहत पैदा हुए उनके जुड़वां बच्चों का डीएनए कथित तौर पर माता-पिता में से किसी से भी मेल नहीं खाया है। इस खुलासे ने संबंधित अस्पताल में भ्रूण के रखरखाव की सुरक्षा एवं गोपनीयता से जुड़े नियमों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पेशे से बिल्डर राहुल राठौर (41) और उनकी पत्नी मीनू (39) ने दावा किया कि वे आईवीएफ केंद्र पर गंभीर सवाल उठाने के बाद डर के साए में गुरुग्राम में रह रहे हैं।

दंपति ने कहा कि उन्हें केवल उनके अपने खुद के बच्चे चाहिए। राठौर ने 'पीटीआई-भाषा' से बातचीत में कहा कि दिल्ली की एक अदालत के आदेश पर 31 मार्च को ग्रेटर कैलाश थाने में संबंधित आईवीएफ केंद्र के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। राठौर ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया, "इसके बावजूद पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है और हम पर हर तरफ से दबाव डाला जा रहा है, लेकिन हम तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक हमें हमारे बच्चे वापस नहीं मिल जाते।"

शिकायतकर्ता के अनुसार, यह मामला दिसंबर 2024 में शुरू हुआ, जब दंपति ने डॉ. रितु गर्ग से परामर्श किया। उन्होंने दंपति को आईवीएफ उपचार के लिए डॉ. मनप्रीत कौर से मिलवाया और इसके बाद उन्हें नयी दिल्ली के ग्रेटर कैलाश-1 स्थित 'एससीआई हॉस्पिटल' भेज दिया गया। आरोप है कि वहां उनकी मुलाकात आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. शिवानी सचदेवा से कराई गई, जिन्होंने उनका उपचार किया। राठौर ने बताया कि पिछले साल नौ जनवरी को आईवीएफ प्रक्रिया के तहत एससीआई हॉस्पिटल में चिकित्सा परीक्षण किए गए थे। चिकित्सकों और कर्मचारियों ने दंपति को आश्वासन दिया था कि पूरी प्रक्रिया पूरी ईमानदारी और नैतिकता के साथ केवल उन्हीं की आनुवंशिक सामग्री (शुक्राणु और अंडे) का उपयोग करके की जाएगी।

उन्होंने दावा किया, "13 फरवरी 2025 को अस्पताल प्रशासन द्वारा मेरी पत्नी के अंडे और मेरे शुक्राणु एकत्र किए गए। हमारी आनुवांशिक सामग्री को अपने संरक्षण में लेकर अस्पताल और चिकित्सक एक विशेष प्रकार की संपत्ति के संरक्षक बन गए थे, जिसके कारण उनका यह कानूनी और नैतिक दायित्व था कि वे इसकी सुरक्षा करें।" राठौर ने आरोप लगाया कि उनकी आनुवंशिक सामग्री से तैयार किए गए भ्रूणों को "अवैध रूप से हटा दिया गया" और उनकी जगह ऐसे भ्रूण प्रत्यारोपित किए गए जो उनसे "आनुवंशिक रूप से संबंधित नहीं थे।" उन्होंने कहा कि 24 मई को गर्भधारण की पुष्टि हुई और इस साल पांच जनवरी को उनकी पत्नी ने दो जुड़वां बेटियों को जन्म दिया।

राठौर ने कहा कि उन्हें और उनकी पत्नी को इसी भरोसे में रखा गया कि दोनों बच्चियां उनकी अपनी असली (जैविक) संतानें हैं। उन्होंने कहा कि कुछ गंभीर चिकित्सीय विसंगतियों के कारण उन्हें और उनकी पत्नी को संदेह हुआ, जिसके बाद उन्होंने इस साल सात जनवरी को 'डीएनए लैब्स इंडिया' और 'डीएनए फॉरेंसिक लैबोरेटरी' के माध्यम से दो स्वतंत्र डीएनए परीक्षण करवाए। बच्ची की पहली डीएनए रिपोर्ट में पिता से मिलान नहीं हुआ और दूसरी रिपोर्ट से यह साफ हो गया कि बच्चियों का डीएनए न तो माता से और न ही पिता से मेल खाता है।

राठौर ने दावा किया कि इन रिपोर्ट से साबित होता है कि उनके भ्रूण को अवैध रूप से बदल दिया गया और किसी अन्य व्यक्ति को दे दिया गया। उन्होंने कहा, "जब हमने डीएनए रिपोर्ट गौरव राठी के सामने रखकर अपने बच्चे की अवैध अदला-बदली पर सवाल उठाया, तो हमें सात जनवरी को अस्पताल बुलाया गया। वहां हमसे कहा गया कि आप जितनी चाहें उतनी रकम ले लीजिए।" 

उन्हें यह भी बताया गया कि उनका "जैविक बच्चा पहले ही किसी अन्य व्यक्ति को दिया जा चुका है" और अस्पताल उस दूसरे परिवार के माध्यम से दंपति को मुआवजा दिला सकता है, जिसे उनका बच्चा सौंपा गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि दंपति को इस मामले को आगे न बढ़ाने की चेतावनी दी गई और पुलिस या किसी अन्य प्राधिकारी के पास जाने पर गंभीर परिणाम भुगतने तथा बच्चों से हाथ धोने की धमकी भी दी गई। इस संबंध में कई बार प्रयास किए जाने के बावजूद, आरोपी आईवीएफ केंद्र की ओर से कोई प्रतिक्रिया या जवाब नहीं मिला। 

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