90 साल की बुजुर्ग जुड़वा बहनों की रुकी पेंशन, कलेक्टर से बोलीं- साहब, मिट गईं लकीरें, अब कैसे भरें पेट?

Edited By Updated: 18 Mar, 2026 10:52 AM

kochi 90 year old twin sisters haven t received their pension for three months

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले से सिस्टम की संवेदनहीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाए। यहां के आनंद नगर की रहने वाली दो जुड़वा बहनें 90 वर्षीय सीता और शांति पिछले तीन महीनों से भूख और बेबसी की मार झेल रही हैं। वजह सिर्फ...

Kochi Twins Pension Stop Biometric Failure : मध्य प्रदेश के खंडवा जिले से सिस्टम की संवेदनहीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाए। यहां के आनंद नगर की रहने वाली दो जुड़वा बहनें 90 वर्षीय सीता और शांति पिछले तीन महीनों से भूख और बेबसी की मार झेल रही हैं। वजह सिर्फ इतनी है कि ढलती उम्र के कारण उनके अंगूठे के निशान (Fingrprints) घिस चुके हैं और सरकारी मशीनें उन्हें पहचानने से इनकार कर रही हैं।

जब अंगूठा बना दुश्मन

सरकारी नियमों के मुताबिक राशन और वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाना अनिवार्य है। सीता और शांति के साथ दिक्कत यह हुई कि उम्र के इस पड़ाव पर उनकी उंगलियों की लकीरें धुंधली पड़ गई हैं। मशीन ने उनके फिंगरप्रिंट स्वीकार करना बंद कर दिया और नतीजा यह हुआ कि पिछले तीन महीने से न उन्हें राशन मिला और न ही पेंशन के पैसे।

व्हीलचेयर पर कलेक्ट्रेट पहुंचीं बेबसी

चलने-फिरने में असमर्थ ये दोनों बहनें जब भूख और तंगी से हार गईं तो किसी तरह व्हीलचेयर के सहारे कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में पहुंचीं। टूटी-फूटी झोपड़ी में रहने वाली इन बहनों के पास अब परिवार के नाम पर कोई नहीं है। पति और भाइयों की मौत के बाद अपनों ने भी किनारा कर लिया। कलेक्ट्रेट में उनकी आंखों में आंसू और चेहरे पर बेबसी देख वहां मौजूद हर शख्स सन्न रह गया।

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प्रशासन की जागी नींद

मामला सुर्खियों में आते ही प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। अपर कलेक्टर ने तुरंत संज्ञान लेते हुए खाद्य विभाग और पेंशन अधिकारियों को मौके पर ही निर्देश दिए। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि तकनीकी बाधाओं को किनारे रखकर (Bypass) उन्हें तत्काल राशन और रुकी हुई पेंशन उपलब्ध कराई जाएगी।

बड़ा सवाल: मशीनी पहचान या मानवीय संवेदना?

यह घटना हमारे सिस्टम पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है:

क्या 90 साल के बुजुर्गों के लिए बायोमेट्रिक के अलावा कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?

क्या एक मशीन तय करेगी कि किसी गरीब को रोटी मिलेगी या नहीं?

ऐसे मामलों में 'आईरिस स्कैन' (आंखों की पुतली का मिलान) या 'फेस रिकग्निशन' जैसे विकल्पों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता?

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