Edited By Anu Malhotra,Updated: 09 Mar, 2026 01:52 PM

Lethal Autonomous Weapon Systems: साइंस-फिक्शन फिल्मों में दिखने वाले विनाशकारी रोबोट अब हकीकत बन चुके हैं। लेथल ऑटोनॉमस वेपन सिस्टम्स (LAWS), जिन्हें 'किलर ड्रोन' भी कहा जाता है, आधुनिक युद्ध के मैदान में प्रवेश कर चुके हैं। ये ऐसे हथियार हैं जो...
Lethal Autonomous Weapon Systems: साइंस-फिक्शन फिल्मों में दिखने वाले विनाशकारी रोबोट अब हकीकत बन चुके हैं। लेथल ऑटोनॉमस वेपन सिस्टम्स (LAWS), जिन्हें 'किलर ड्रोन' भी कहा जाता है, आधुनिक युद्ध के मैदान में प्रवेश कर चुके हैं। ये ऐसे हथियार हैं जो किसी इंसान के आदेश का इंतजार किए बिना खुद लक्ष्य चुनते हैं और उसे तबाह कर देते हैं। इस तकनीक ने पूरी दुनिया को दो धड़ों में बांट दिया है, जहां 30 से अधिक देश इन पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं।
आखिर क्या हैं ये ऑटोनॉमस किलर ड्रोन?
ये मशीनें युद्ध की पूरी प्रक्रिया को स्वचालित (Automate) कर देती हैं। एक बार सक्रिय होने के बाद, ये तीन मुख्य कार्य बिना मानवीय हस्तक्षेप के करती हैं:
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टारगेट की खोज करना
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दुश्मन की पहचान करना
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हमला करना
इन हथियारों की तीन प्रमुख श्रेणियां:
| श्रेणी |
मानवीय नियंत्रण |
विवरण |
| Human-in-the-loop |
पूर्ण |
हमला करने से पहले इंसान की अंतिम मंजूरी अनिवार्य है। |
| Human-on-the-loop |
आंशिक |
मशीन खुद निर्णय ले सकती है, लेकिन इंसान उसे किसी भी समय रोक सकता है। |
| Human-out-of-the-loop |
शून्य |
मशीन पूरी तरह स्वतंत्र है। यही असली LAWS हैं, जिन पर विवाद है। |
कैसे काम करता है इनका 'डिजिटल दिमाग'?
इन किलर मशीनों की असली शक्ति आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेंसर नेटवर्क में छिपी है:
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सेंसिंग तकनीक: इनमें LiDAR (लेजर आधारित 3D मैपिंग), थर्मल कैमरे (शरीर की गर्मी पहचानने के लिए) और रडार का इस्तेमाल होता है। ये सब मिलकर युद्ध क्षेत्र की एक सटीक डिजिटल तस्वीर तैयार करते हैं।
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डीप लर्निंग: इनका AI सिस्टम लाखों डेटा पॉइंट्स और तस्वीरों पर प्रशिक्षित होता है। यह पलक झपकते ही तय कर लेता है कि सामने खड़ा व्यक्ति एक सैनिक है या निर्दोष नागरिक।
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थ्रेट असेसमेंट: हमला करना है या नहीं, इसका फैसला एक एल्गोरिद्म लेता है जो खतरे के स्तर और सैन्य लाभ का आकलन करता है।
नेविगेशन और स्ट्राइक क्षमता
अगर युद्ध के दौरान GPS जाम कर दिया जाए, तब भी ये ड्रोन SLAM (Simultaneous Localization and Mapping) तकनीक के जरिए अपना रास्ता खुद बना लेते हैं। इसके अलावा, स्वॉर्म टेक्नोलॉजी के जरिए सैकड़ों ड्रोन एक मधुमक्खी के छत्ते की तरह नेटवर्क बनाकर एक साथ हमला कर सकते हैं।
दुनिया के सबसे खतरनाक Autonomous Weapons
वर्तमान में कई देश इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं:
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हारोप (इजराइल): यह हवा में घंटों मंडराता रहता है और रडार सिग्नल मिलते ही आत्मघाती हमला करता है।
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जाला KYB (रूस): कलाश्निकोव द्वारा निर्मित एक घातक स्वायत्त ड्रोन।
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MQ-28 घोस्ट बैट (अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया): यह लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर खुद निर्णय लेने में सक्षम है।
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कार्गु-2 (तुर्की): संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2021 में लीबिया में इसने संभवतः पहली बार बिना मानवीय आदेश के हमला किया था। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 में लीबिया में पहली बार ऐसी घटना दर्ज की गई जहाँ एक ऑटोनॉमस ड्रोन ने बिना किसी मानवीय निर्देश के स्वतः ही इंसानों पर हमला किया।
नैतिकता और सुरक्षा: क्यों हो रहा है विरोध?
संयुक्त राष्ट्र में ऑस्ट्रिया और न्यूजीलैंड जैसे 30 से ज्यादा देश इन पर प्रतिबंध चाहते हैं। उनकी मुख्य चिंताओं की अहम वजह है कि:
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जवाबदेही का अभाव: अगर मशीन किसी बेगुनाह को मार देती है, तो जिम्मेदार कौन होगा? प्रोग्रामर, सेना या कंपनी?
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हैकिंग का डर: यदि दुश्मन इन मशीनों को हैक कर ले, तो ये अपने ही देश की सेना पर पलटवार कर सकती हैं।
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नैतिक पतन: क्या किसी मशीन को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह किसी इंसान की जान ले? AI में मानवीय संवेदना और नैतिकता का अभाव होता है।
मानवता के लिए बड़ा खतरा
जहां अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश इसे सैन्य बढ़त के लिए जरूरी मान रहे हैं, वहीं मानवाधिकार संगठन इसे मानवता के लिए बड़ा खतरा बता रहे हैं। युद्ध का भविष्य अब गोलियों से ज्यादा एल्गोरिद्म पर निर्भर होता जा रहा है।