सर्दियों में कम ठंड और 2027 में लू का प्रकोप बढ़ा सकता है 'सुपर अल नीनो'- रबी की फसलों पर पड़ेगा सीधा असर

Edited By Updated: 15 Oct, 2026 10:04 AM

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इस साल मानसून के दौरान देश में सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इसके बाद अब भारत पर गर्म सर्दियों और साल 2027 में भीषण गर्मी का बड़ा खतरा मंडराने लगा है।

नई दिल्ली: इस साल मानसून के दौरान देश में सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इसके बाद अब भारत पर गर्म सर्दियों और साल 2027 में भीषण गर्मी का बड़ा खतरा मंडराने लगा है। मौसम वैज्ञानिकों की चिंता इस बात पर बढ़ गई है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Nino) और अधिक मजबूत हो सकता है। इस स्थिति के असर से आने वाली सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहने, पहाड़ी इलाकों में कम बर्फबारी होने और अगले साल गर्मियों के मौसम में लू  का प्रकोप काफी ज्यादा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

क्या है सुपर अल नीनो की स्थिति?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ सकता है। जब यह स्थिति बहुत अधिक मजबूत हो जाती है, तो इसे 'सुपर अल नीनो' कहा जाता है। हालांकि, मौसम विज्ञान में यह कोई आधिकारिक श्रेणी नहीं है, इसलिए इसकी सटीक तीव्रता को लेकर अभी से कोई आखिरी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके संभावित प्रभाव काफी गंभीर हो सकते हैं।

जल संकट का बढ़ता गंभीर दबाव
मानसून के दौरान कम बारिश होने की वजह से देश के जलाशयों, भूजल स्तर और खेतों की मिट्टी में नमी की उपलब्धता पर भारी दबाव पड़ गया है। महाराष्ट्र और अन्य राज्य, महाराष्ट्र में जल भंडारों की घटती स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा पानी की कटौती जैसे कदम उठाए जाने लगे हैं। देश के अन्य राज्यों की सरकारें भी इस संभावित जल संकट पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अगर सर्दियों के मौसम में पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में यह चुनौती और अधिक विकट हो सकती है।

रबी की फसलों पर पड़ेगा सीधा असर
सर्दियों के दौरान अगर तापमान सामान्य से ज्यादा रहता है, तो गेहूं समेत अन्य रबी फसलों की बढ़वार और कुल पैदावार पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।
तापमान बढ़ने से फसलों को ज्यादा सिंचाई की जरूरत पड़ेगी। दूसरी ओर, जल स्रोतों में पानी की उपलब्धता सीमित रहने की वजह से किसानों की मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, पहाड़ी क्षेत्रों में कम बर्फबारी होने से पिघलने वाली बर्फ पर निर्भर रहने वाली नदियां और अन्य जल स्रोत भी प्रभावित होंगे।

अगले मानसून और गर्मियों पर भी नजर
अगर अल नीनो का यह प्रभाव साल 2027 की गर्मियों तक बना रहता है, तो तापमान और लू का खतरा और अधिक बढ़ जाएगा। हालांकि, क्या इसका असर अगले साल के मानसून पर भी पड़ेगा और बारिश कम होगी, इस बारे में फिलहाल कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। मौसम जानकारों का मानना है कि हिंद महासागर की परिस्थितियां और अन्य मौसमी प्रणालियां भी मानसून को प्रभावित करती हैं। ऐसे में किसी भी बड़ी आपदा से बचने के लिए समय रहते जल संरक्षण, सही सिंचाई प्रबंधन और गर्मी से बचाव की पुख्ता तैयारियां करना बेहद जरूरी है। 

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