30 हजार प्रतिमाह... घर संभालना भी है फुल-टाइम जॉब, गृहिणियों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Edited By Updated: 12 Jun, 2026 10:58 AM

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सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को 'राष्ट्र निर्माता' के रूप में मान्यता दिए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए वीरवार को कहा कि पत्नी द्वारा घर-परिवार की देखभाल से मिलने वाली सेवाओं की क्षति का मौद्रिक मूल्यांकन कम से कम 30,000 रुपए प्रतिमाह के आधार पर...

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को 'राष्ट्र निर्माता' के रूप में मान्यता दिए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए वीरवार को कहा कि पत्नी द्वारा घर-परिवार की देखभाल से मिलने वाली सेवाओं की क्षति का मौद्रिक मूल्यांकन कम से कम 30,000 रुपए प्रतिमाह के आधार पर किया जाना चाहिए। मोटर वाहन अधिनियम से जुड़े मामलों पर व्यापक प्रभाव डालने वाले एक फैसले में न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एक व्यक्ति को उसकी पत्नी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के कारण अतिरिक्त मुआवजा प्रदान करते हुए यह आदेश पारित किया। 

पीठ ने कहा, ''हमारा यह भी मत है कि गृहिणी व्यक्ति और राष्ट्र, दोनों के विकास में योगदान देती है। गृहिणी राष्ट्र का निर्माण करती है। इसलिए हमने इस संबंध में सिद्धांत निर्धारित किए हैं और गृहिणी को 'राष्ट्र निर्माता' मानते हुए उसकी घरेलू देखभाल संबंधी सेवाओं के नुकसान का मासिक मूल्य किसी भी स्थिति में न्यूनतम 30,000 रुपये निर्धारित किया है।'' 

मृत गृहिणियों के लिए मुआवजे का निर्धारण पहले प्रचलित न्यूनतम मजदूरी के आधार पर काल्पनिक आय तय करके किया जाता था, जिसमें उन्हें कुशल या अकुशल श्रमिकों के समान माना जाता था। शीर्ष अदालत ने कहा कि गृहिणी को परिवार के कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर बताना विडंबनापूर्ण है, जबकि वास्तव में परिवार का संचालन काफी हद तक गृहिणी पर निर्भर करता है। पीठ ने कहा, ''हम उम्मीद करते हैं कि घर की महिला के योगदान को मान्यता देते हुए भविष्य में 'हाउसवाइफ' या 'होममेकर' (गृहिणी) के लिए 'राष्ट्र निर्माता' शब्द का प्रयोग किया जाएगा।'' 

अदालत ने कहा, ''वास्तव में कमाने वाले सदस्य पूरी तरह गृहिणी पर निर्भर होते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश इस वास्तविकता को वह मान्यता नहीं मिलती जो उसे मिलनी चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में इस दिशा में कुछ हद तक प्रयास हुए हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अभी लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है।'' शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं का बिना वेतन वाला देखभाल कार्य भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 15 से 17 प्रतिशत का योगदान देने का अनुमान है, फिर भी यह कार्य अवैतनिक ही बना हुआ है और इस कोई मान्यता नहीं मिलती। पीठ ने कहा, ''समाज में महिलाओं का योगदान केवल जैविक प्रजनन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे मानव पूंजी के निर्माण की भी प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं, जिस पर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के सपने सहित अन्य लक्ष्य आधारित हैं।'' 

अदालत ने कहा, ''सीधे शब्दों में कहें तो 'गृहिणियां' वास्तव में 'राष्ट्र निर्माता' हैं और उन्हें उसी रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।'' मोटर दुर्घटना मुआवजा दावों के मामलों में होने वाली देरी पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से मोटर वाहन अधिनियम से संबंधित मामलों की प्रगति की निगरानी करने को कहा। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से कहा गया कि वे ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए जरूरी निर्देश दें जो बहुत लंबे समय से लंबित हैं और उन्हें अपील दायर करने की तारीख के अनुसार उचित पीठों के समक्ष सूचीबद्ध कराएं। 

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पंजाब से जुड़े एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में आया, जिसमें 25 नवंबर 2001 को एक सड़क दुर्घटना में एक महिला की मृत्यु हो गई थी। मृतका के पति और उसके तीन बच्चों ने मुआवजे का अनुरोध करते हुए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण का रुख किया था, जिसने उन्हें 2.42 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करने का आदेश दिया। मुआवजे की राशि से असंतोष जताते हुए शिकायतकर्ताओं ने राशि बढ़ाने का अनुरोध करते हुए हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दी और उस पर 7.5 प्रतिशत ब्याज देने का भी आदेश दिया। इसके बावजूद असंतोष जताते हुए याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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