छोटे कार मालिकों की मौज खत्म! नियम बदलते ही Auto Industry में मच गया हड़कंप, जानें क्या होगा असर?

Edited By Updated: 08 Feb, 2026 12:53 PM

the fun of small petrol cars is over the government withdraws concessions

भारत सरकार ने ऑटो सेक्टर के लिए एक ऐसा कड़ा फैसला लिया है जिसने कार निर्माताओं के बीच खलबली मचा दी है। केंद्र सरकार ने आगामी 'फ्यूल एफिशिएंसी' (ईंधन दक्षता) नियमों में छोटी और हल्की पेट्रोल कारों को दी जाने वाली प्रस्तावित छूट को पूरी तरह रद्द कर...

India Auto Policy Shift : भारत सरकार ने ऑटो सेक्टर के लिए एक ऐसा कड़ा फैसला लिया है जिसने कार निर्माताओं के बीच खलबली मचा दी है। केंद्र सरकार ने आगामी 'फ्यूल एफिशिएंसी' (ईंधन दक्षता) नियमों में छोटी और हल्की पेट्रोल कारों को दी जाने वाली प्रस्तावित छूट को पूरी तरह रद्द कर दिया है। इस फैसले से साफ हो गया है कि अब सिर्फ वजन घटाकर या छोटी कारें बनाकर कड़े प्रदूषण नियमों से बचना मुमकिन नहीं होगा।

क्या था विवाद और सरकार का यू-टर्न?

सितंबर में जारी एक ड्राफ्ट में सरकार ने प्रस्ताव दिया था कि 909 किलोग्राम से कम वजन वाली पेट्रोल कारों को फ्यूल एफिशिएंसी नियमों में कुछ ढील दी जाएगी।

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नए CAFE नियम: अब हर ग्राम का होगा हिसाब

नए कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी (CAFE) नियम अप्रैल 2027 से लागू होंगे।

  1. वजन आधारित राहत खत्म: पहले भारी गाड़ियों को नियमों में जो ज्यादा ढील मिलती थी उसे अब काफी कम (ओवर-कंपनसेशन रिडक्शन) कर दिया गया है।

  2. असली सुधार पर जोर: कंपनियों को अब कागजी आंकड़ों के बजाय 'रियल-वर्ल्ड' एफिशिएंसी सुधारनी होगी।

  3. भारी जुर्माना: नियमों का पालन न करने पर प्रति कार लगभग $550 (करीब 45,000+ रुपये) तक का भारी जुर्माना देना पड़ सकता है।

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ईवी और हाइब्रिड ही हैं भविष्य की चाबी

सरकार ने साफ कर दिया है कि जो कंपनियां पर्यावरण के अनुकूल तकनीक अपनाएंगी उन्हें ही फायदा मिलेगा। इलेक्ट्रिक (EV) और प्लग-इन हाइब्रिड कारें बेचने वाली कंपनियों को 'क्रेडिट्स' दिए जाएंगे जिससे उन्हें नियमों के पालन में आसानी होगी। सरकार का टारगेट है कि 2032 तक कारों का औसत कार्बन उत्सर्जन 114 ग्राम/किमी से घटकर 100 ग्राम/किमी पर आ जाए।

इंडस्ट्री पर क्या होगा असर?

इस फैसले के बाद अब मारुति सुजुकी को भी अपनी छोटी कारों में हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक तकनीक को तेजी से शामिल करना होगा। वहीं टाटा और महिंद्रा जैसी कंपनियों को अपनी भारी SUVs की एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए और ज्यादा निवेश करना पड़ेगा। कुल मिलाकर अब असली मुकाबला इंजन की तकनीक और टिकाऊ मोबिलिटी पर टिक गया है।

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