अब सरकार तय करेगी UPI पर चार्ज लगेगा या नहीं, लोकसभा में पास हुआ बिल

Edited By Updated: 06 Aug, 2026 05:38 PM

the government will now decide whether or not charges will apply to upi

लोकसभा ने सरकार को बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं को 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (यूपीआई) और अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की अनुमति प्रदान करने का अधिकार देने संबंधी एक विधेयक बृहस्पतिवार को पारित कर दिया।

नेशनल डेस्क : लोकसभा ने सरकार को बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं को 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (यूपीआई) और अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की अनुमति प्रदान करने का अधिकार देने संबंधी एक विधेयक बृहस्पतिवार को पारित कर दिया। यह सरकार को बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं को 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (यूपीआई) और अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक तरीकों से होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की अनुमति प्रदान करने का अधिकार देता है।

सदन में विपक्षी सदस्यों के हंगामे के बीच, चर्चा के बिना पारित किए गए 'कराधान एवं अन्य विधियां संशोधन विधेयक, 2026' का मकसद उस मौजूदा कानूनी प्रावधान को हटाना है, जो बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक भुगतान तरीकों पर 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (एमडीआर) लागू करने से रोकता है। आरटीजीएस और एनईएफटी के जरिए होने वाले रियल-टाइम भुगतान के लिए सेवा शुल्क देना पड़ता है। हालांकि, अब तक यूपीआई लेनदेन को ऐसे शुल्क से छूट प्राप्त है।

'संदाय और निपटान प्रणाली अधिनियम' में प्रस्तावित बदलाव कराधान से जुड़े एक बड़े कानून का हिस्सा हैं। 'कराधान एवं अन्य विधियां संशोधन विधेयक, 2026' का उद्देश्य 'संदाय और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007', 'आयकर अधिनियम, 2025' और 'वित्त अधिनियम, 2026' में संशोधन करना है। सरकार का मकसद उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों के लिए डिजिटल भुगतान सेवाओं पर छोटे शुल्क लगाना है, साथ ही बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं (पीएसपी) तथा भुगतान अवसंरचना कंपनियों के लिए एक टिकाऊ राजस्व मॉडल सुनिश्चित करना है, जो डिजिटल भुगतान व्यवस्था को संचालित करती हैं।

विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि 'संदाय और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007' की धारा 10ए बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक भुगतान पर कोई शुल्क लगाने से रोकती है, वहीं आयकर अधिनियम की धारा 269एसयू के तहत 50 करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार वाले बड़े व्यवसायों के लिए 'रुपे' डेबिट कार्ड और भीम-यूपीआई क्यूआर कोड सहित कुछ निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भुगतान स्वीकार करना अनिवार्य है। वर्तमान में, कोई भी बैंक या भुगतान प्रणाली प्रदाता आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 269एसयू के निर्दिष्ट इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए किसी पर भी सीधे या परोक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लगा सकता है।

इस मुद्दे पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने बुधवार को कहा कि डिजिटल तरीकों से भुगतान पर एमडीआर के बारे में बात करना अभी "जल्दबाजी" होगी। उन्होंने कहा कि भुगतान जैसे सार्वजनिक ढांचों में निवेश ज़रूरी है और उन्होंने यह बात दोहराई कि इसके लिए किसी न किसी को तो पैसा चुकाना ही होगा। मल्होत्रा ने कहा, ''हमारे सामने आसान विकल्प हैं: या तो आम जनता को शुल्क के ज़रिए इसके लिए भुगतान करना होगा, या फिर 'यूज़र पेज़' (इस्तेमाल करने वाला पैसा अदा करे) मॉडल को अपनाते हुए हमें मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगाना होगा।'' उन्होंने कहा, ''अभी सरकार संशोधन ला रही है। लागत का भुगतान तो किसी न किसी को करना ही होगा। हम सभी चाहते हैं कि यह सार्वजनिक बुनियादी ढांचा मज़बूत और अधिक सक्षम बने। हम ऐसा करना जारी रखेंगे। अभी हमारा ध्यान इसी पर है। आगे क्या होता है, इंतजार करते हैं और देखते हैं।'' देश में एमडीआर लगाना एक पेचीदा मुद्दा बन गया है। 

भुगतान से संबंधित क्षेत्र यानी बैंकर और दूसरे लोग इसकी मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक इस मामले में कोई कदम नहीं उठाया है। वहीं, यूपीआई जैसे डिजिटल भुगतान के तरीकों का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि व्यवसायी और ग्राहक के बीच एक निश्चित रकम से ज़्यादा के यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर लग सकता है, लेकिन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को भुगतान पर नहीं। आरबीआई के गवर्नर ने कहा कि अहम बात यह है कि 'सर्विस' के लिए किसी न किसी को तो पैसे देने ही होंगे। मल्होत्रा ​​ने कहा कि 'यूज़-पे' (इस्तेमाल करो और भुगतान करो) सिद्धांत के तहत, लेनदेन करने वाले व्यक्ति या मर्चेंट से ही एमडीआर वसूला जाता है, लेकिन अगर एमडीआर न भी हो, तो भी आम जनता कर के ज़रिए इसके लिए भुगतान करती है। 

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