Edited By Ramanjot,Updated: 25 Mar, 2026 01:08 PM

हरीश राणा की दर्दनाक मौत ने क्वाड्रिप्लेजिया जैसे गंभीर हालात पर ध्यान खींचा है। बाइक दुर्घटना के बाद उन्हें रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगी, जिससे पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया।
Harish Rana Case: जीवन और मृत्यु के बीच 13 वर्षों तक झूलने के बाद, गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा का संघर्ष आखिरकार समाप्त हो गया। सुप्रीम कोर्ट से 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छा मृत्यु) की ऐतिहासिक अनुमति मिलने के बाद, दिल्ली एम्स (AIIMS) में जीवन रक्षक प्रणाली (लाइफ सपोर्ट) हटाने की प्रक्रिया पूरी की गई। हरीश के इस मामले ने न केवल कानूनी गलियारों में हलचल मचाई है, बल्कि 'क्वाड्रिप्लेजिया' जैसी दर्दनाक मेडिकल स्थिति की ओर भी पूरे देश का ध्यान खींचा है।
एक हादसे ने बदली जिंदगी: 2013 से 'वेजिटेटिव स्टेट' में थे हरीश
हरीश राणा की कहानी किसी भी युवा के लिए एक सबक की तरह है। साल 2013 में, जब वह पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे, तब हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर और गर्दन में गंभीर चोटें आई थीं। इस हादसे के बाद हरीश 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' में चले गए। वह न बोल सकते थे, न चल सकते थे और न ही खुद से भोजन कर सकते थे। उनकी हर सांस मशीनों और मेडिकल सपोर्ट की मोहताज थी। लंबे इलाज और भारी खर्च के बावजूद जब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची, तब परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
क्या है 'क्वाड्रिप्लेजिया'? जिससे शरीर बन जाता है पत्थर
हरीश राणा जिस स्थिति से गुजर रहे थे, उसे चिकित्सा विज्ञान में क्वाड्रिप्लेजिया (Quadriplegia) कहा जाता है। यह एक ऐसी गंभीर स्थिति है जिसमें व्यक्ति के दोनों हाथ और दोनों पैर पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं। यह समस्या तब होती है जब गर्दन के पास 'स्पाइनल कॉर्ड' (मेरुदंड) में गंभीर चोट लगती है।
प्रभाव: स्पाइनल कॉर्ड दिमाग से शरीर के अंगों तक संकेत पहुंचाने का काम करती है। इसके डैमेज होने पर दिमाग का शरीर के निचले अंगों से संपर्क टूट जाता है, जिसे 'सर्वाइकल स्पाइन कॉर्ड इंजरी' भी कहते हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी: सड़क हादसे हैं सबसे बड़ी वजह
डॉक्टरों के अनुसार, वर्तमान में क्वाड्रिप्लेजिया के अधिकांश मामलों का मुख्य कारण सड़क दुर्घटनाएं हैं। बाइक चलाते समय हेलमेट न पहनना या तेज रफ्तार में गिरना सीधे गर्दन पर वार करता है, जिससे स्पाइनल कॉर्ड टूटने का खतरा रहता है। एक पल की लापरवाही इंसान को ताउम्र के लिए बिस्तर पर ला सकती है, जैसा हरीश राणा के मामले में हुआ।
सुप्रीम कोर्ट का मानवीय फैसला
हरीश की स्थिति में सुधार की कोई संभावना न देखते हुए, देश की शीर्ष अदालत ने 'पैसिव यूथेनेशिया' की अनुमति दी। एम्स दिल्ली में विशेषज्ञों की देखरेख में धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाया गया, जिसके बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। यह मामला भारत में इच्छा मृत्यु के कानूनी और नैतिक पहलुओं पर एक नई मिसाल पेश करता है।