जीवन मात्र एक क्रीड़ा है, इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं

  • जीवन मात्र एक क्रीड़ा है, इसको गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं
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Tuesday, November 28, 2017-10:02 AM

अहंकार बहुत कटु और कठोर है। इस ‘मैं’ को प्रयास से नहीं बल्कि दृष्टा बनकर विलीन कर सकते हैं। यदि अहम को मिटाने का प्रयास करें तो यह उतना ही दृढ़ हो जाता है। 
बहुत से लोग अहम को मिटाने का या उसे दूर करने का उपदेश देते हैं। यह संभव नहीं है परंतु सजग बने रहने से और विश्रामपूर्ण मन से उस परम और सर्वव्यापक उपस्थिति की प्रतीति बनी रहे तो अहं भाव स्वत: तिरोहित हो जाता है। 

 

इस तरह व्यक्तित्व में वांछित जीवन मूल्य प्रकट होने लगते हैं। अगर तुम पीछे मुड़ कर देंखे तो तुम्हें अपना बीता हुआ जीवन एक स्वप्न की भांति प्रतीत होगा। अपना बीता हुआ भूतकाल, आज के इस क्षण तक क्या यह सब एक स्वप्र समान नहीं है?

 

अमुक दिन आप कुछ कर रहे थे तब आपकी मनोदशा कैसी थी? कभी नववर्ष मना रहे थे तो कभी क्रिसमस के उपहारों का आनंद ले रहे थे। और पीछे जाइए तो कभी रोने-धोने का नाटक चलता था। उससे भी पीछे स्कूल के दिन, कई वर्षों तक सुबह स्कूल जाना और शाम को लौटना यही दिनचर्या रही।

 

इस दिनचर्या से अब तक सप्ताहान्त की प्रतीक्षा करते थे। सब कहां चला गया। बीता पल एक सपने की भांति खो गया। भविष्य में भी क्या होने वाला है। कुछ और समय बीतेगा और फिर कुछ समय और इसमें क्या हो सकता है? कभी खुश हो लोगे तो कभी रो-धो लोगे परंतु फिर भी क्या हुआ।

 

जो भी कुछ होगा, समय के साथ बहता जाएगा। अत: चिंतित होने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारा खुशी प्राप्त करने का प्रयास ही तुम्हें रुला देता है, तुम्हारे दुख का कारण बन जाता है। वास्तव में अपना भविष्य संवारने के लिए तुम्हें कुछ भी नहीं करना। वर्तमान में आनदिंत हो जाओ। जीवन तो बस एक खेल है इसका कोई उद्देश्य नहीं, कोई प्रयोजन नहीं। जीवन तो ईश्वर के ऐश्वर्य की अभिव्यक्ति है। इसमें तुम कर्ता नहीं हो- सब कुछ विराट मन द्वारा हो रहा है।

 

अब एक बड़ा प्रश्न तुम्हारे मन में उठता है कि यदि संसार स्वचालित है तो अपनी स्वतंत्रता क्या है? भाग्य क्या है? अब घटनाएं तुम्हारे विचारों के अनुकूल होती हैं तो तुम उसे अपनी संकल्प शक्ति समझ लेते हो। जब कुछ तुम्हारे विचारों के प्रतिकूल घटता है तो तुम उसे भाग्य कह देते हो। बस इतनी-सी बात है। 

 

जीवन की सभी सुखद अथवा दुखद घटनाएं तुम्हारा स्वयं का चयन है। कभी सुखी हुए और कभी दुखी तो क्या हुआ? जीवन को इतनी गंभीरता से क्यों लेते हो? इतनी गंभीरता से लेने योग्य कुछ भी तो नहीं है। सब कुछ एक खेल है। भारत में इसके लिए एक सुंदर शब्द है लीला। लीला का अर्थ है- क्रीड़ा, खेल। जीवन जिस रूप में है सुंदर है। सब बुद्ध पुरुष यही कहते हैं कि जीवन को इतनी गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं-यह मात्र क्रीड़ा है। तुम एक स्वप्र के लिए इतने परेशान क्यों हो? यह जागरण या बोध का अर्थ है। कल एक दु:स्वप्न देखा तो क्या? अब वह कहां है? बस इसी बोध से इस क्षण जाग जाओ। सपनों का विश्लेषण मत करो। यह मूर्खता है।
 

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