असहनशीलता व धार्मिक उन्माद के बीच रौशन हैं ‘भाईचारे के चिराग’

Edited By Updated: 04 Mar, 2026 03:34 AM

amid religious frenzy the  lamps of brotherhood  shine

जहां देश में एक ओर असहनशीलता और धार्मिक उन्माद जैसे मुद्दे तनाव का कारण बने हुए हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के विभिन्न लोगों के बीच परस्पर भाईचारे के अनुकरणीय उदाहरण भी सामने आ रहे हैं जिसके गत 2 सप्ताह में सामने आए चंद उदाहरण...

जहां देश में एक ओर असहनशीलता और धार्मिक उन्माद जैसे मुद्दे तनाव का कारण बने हुए हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के विभिन्न लोगों के बीच परस्पर भाईचारे के अनुकरणीय उदाहरण भी सामने आ रहे हैं जिसके गत 2 सप्ताह में सामने आए चंद उदाहरण निम्न में दर्ज हैं : 

* 15 फरवरी, 2026 को केरल के कोट्टायम में स्थित ‘कुमरनल्लूर मक्का मस्जिद’ ने भाईचारे का अनूठा उदाहरण पेश किया। जब 62 वर्षीय हिन्दू महिला ‘ओमाना’ के घर  में अंतिम संस्कार की रस्में निभाने के लिए जगह नहीं थी, तो वहां की मस्जिद कमेटी ने अपने मदरसा हाल में अंतिम संस्कार की रस्में निभाने की अनुमति दी।
* 25 फरवरी, 2026 को सोशल मीडिया पर एक भावुक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक हिंदू युवक अपने मुस्लिम दोस्त के लिए ‘सहरी’ (रोजादार का सुबह का भोजन) तैयार करता नजर आ रहा है। 
* 27 फरवरी, 2026 को ‘तिरुवनंतपुरम’ (केरल) की प्राचीन और लगभग 200 वर्ष पुरानी ‘पालयम जुमा मस्जिद’ के इमाम ‘सुहैल’ ने अपने मुस्लिम अनुयायियों से आग्रह किया कि वे अगले सप्ताह ‘अट्टुकल भगवती मंदिर’ के ‘पोंगल उत्सव’ के लिए शहर में आने वाली (हिन्दू) महिलाओं और बच्चों के लिए मस्जिदों और अपने मकानों को खुला रखें।
अपने भाषण में उन्होंने कहा, ‘‘पोंगल इस बार रमजान के महीने में हो रहा है। हम ‘अट्टुकल पोंगल’ के रीति-रिवाजों और कार्यक्रमों का हिस्सा नहीं हैं लेकिन सैंकड़ों बहनें (महिलाएं) और बच्चे ‘तिरुवनंतपुरम’ शहर में मेहमान बनकर आएंगे। हमें उनका बेहतरीन स्वागत करना होगा। हमें उन्हें पीने का पानी और रमजान के पकवान देने होंगे।’’ 

* 28 फरवरी, 2026 को ‘कासरगोड’ (केरल) में सदियों पुराने ‘थचांगड’ स्थित ‘श्री पूथनम कुझी मंदिर’ में ‘ब्रह्मकलशोत्सव’ के अंतर्गत मुस्लिम भाईचारे के लिए ‘इफ्तार’ (रमजान के दिनों में शाम का व्रत खोलना) का आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में मुस्लिम रोजादारों ने भव्य मंदिर प्रांगण में करीने से सजी मेजों पर खजूर और अन्य स्वादिष्ट व्यंजनों से रोजा खोला। 
* 28 फरवरी, 2026 को ही केरल के एक मंदिर ने साम्प्रदायिक एकता की मिसाल पेश करते हुए रमजान के दौरान अपने मुस्लिम ‘महावत’ (हाथी की देखभाल करने वाला) के लिए ‘सहरी’ (सुबह का भोजन) का प्रबंध किया।
यही नहीं ‘बुरहानपुर’ (मध्य प्रदेश) के बोदरली गांव में जहां एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता वहां का ङ्क्षहदू समाज पीढिय़ों से हजरत सैयद बोदलशाह वली बाबा की दरगाह की देखरेख और सेवा कर रहा है।
‘ङ्क्षहदू-मुस्लिम भाईचारे’ के उक्त समाचारों के साथ ही ‘बाड़मेर’ (राजस्थान) के जिले में वर्षों से हिन्दू-मुस्लिम एकता और भाईचारे का प्रतीक ‘सोडिय़ार’ गांव का उल्लेख भी जरूरी है। यहां रमजान के पवित्र महीने और फाल्गुन के होली महोत्सव के दौरान हिन्दू और मुसलमान साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश करते हैं।

मुस्लिम भाई दिन में रोजा रखते हैं और रात होते ही हिन्दू भाइयों के साथ पारम्परिक वेशभूषा में ढोलक की थाप पर एक साथ सामूहिक ‘गैर’ नृत्य करते हैं। लम्बे समय से 85 वर्षीय ‘सुलेमान चाचा’ दोनों समुदायों की नई पीढ़ी के सदस्यों को गैर नृत्य सिखाते आ रहे हैं। यह परम्परा कम से कम चार पीढिय़ों से चली आ रही है। होली के दिन गांव का मैदान एक रंगीन उत्सव में बदल जाता है। मुस्लिम युवा भी पारंपरिक ढोल-नगाड़ों के साथ ‘गैर’ में शामिल होते हैं, रंग लगाते हैं और एक-दूसरे को होली की बधाई देते हैं। यह ‘गंगा-जमुनी’ तहजीब की सच्ची मिसाल है। पाठकों को होली की बधाई देते हुए हम यह कामना करते हैं कि सब लोगों के जीवन में हर ओर प्रसन्नता और प्रेम प्यार के रंग बिखरे रहें और लोगों पर प्यार का इतना गहरा रंग चढ़े कि उसके सामने दूसरे सारे रंग फीके पड़ जाएं तथा भाईचारे के चिराग इसी तरह रोशन रहें।—विजय कुमार 

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