Edited By ,Updated: 02 Nov, 2026 04:43 AM

विदेश जाने वाले भारतीय छात्र या अमरीकी तथा अन्य देशों की ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के क्षेत्र में काम करने वाली कम्पनियों में भारतीय बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।
विदेश जाने वाले भारतीय छात्र या अमरीकी तथा अन्य देशों की ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के क्षेत्र में काम करने वाली कम्पनियों में भारतीय बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। इस वर्ष के शुरू में भारत में एक बड़े ए.आई. कार्यक्रम में, जिसमें फ्रांस के राष्टï्रपति मैक्रों भी शामिल हुए थे, गुडग़ांव के स्कूल के एक छात्र ‘प्रणेत खेतान’ द्वारा ए.आई. से निर्मित व्यक्ति की अस्पष्ट बोली को साफ शब्दों में बदलने में सक्षम माचिस की डिबिया के आकार के डिवाइस को अत्यंत सराहना मिली। इससे स्पष्टï है कि भारतीय छात्रों में प्रतिभा तो बहुत है परंतु क्या यह प्रतिभा भारत के सभी स्कूली छात्रों में है? एक ओर वे बच्चे हैं जो ए.आई. बनाना सीख रहे हैं और इसका इस्तेमाल अपनी रचनात्मकता बढ़ाने तथा समस्याएं सुलझाने के लिए कर रहे हैं तो दूसरी ओर लाखों ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें शायद यह भी नहीं पता कि ए.आई. जैसी कोई चीज मौजूद है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे पैदा होने वाला अंतर आगे चलकर एक बड़े संकट का रूप ले सकता है।
प्रश्न यह नहीं कि बच्चों को सिर्फ कम्प्यूटर चलाने की शिक्षा देना या उन्हें ‘इंसानी कौशल’ (स्किल थिंकिंग) सिखाना है, बल्कि यह है कि उन्हें ‘आलोचनात्मक मूल्यांकन’ (डीप थिंकिंग) में सक्षम बनाने की जरूरत है। यानी कम्प्यूटर जो सुझाव दे, उसे आंख मूंद कर स्वीकार करना नहीं बल्कि बच्चों को इस योग्य बनाना है कि वे सही और गलत के बीच अंतर कर सकें, क्योंकि इस समय बड़े स्तर पर रील्स, डाटा आदि के रूप में जो ए.आई. सामने आ रही है, उससे आम लोगों के लिए सही और गलत के बीच अंतर कर पाना बहुत कठिन हो जाएगा।
आज हम ऐसे पड़ाव पर खड़े हैं जहां हम या तो मशीन के नियंत्रण में आ जाएंगे या हम इतने सक्षम हो जाएंगे कि मशीन (ए.आई.) को नियंत्रित कर सकें और यह क्षमता हमारी शिक्षा से ही आएगी। अत: हमारे बच्चों में ऐसी क्षमता पैदा करनी होगी कि उनका मस्तिष्क सिर्फ विचारवान और संयमी ही नहीं समाधान निकालने वाला भी हो। ऐसा नहीं कि ए.आई. रूपी उपकरण से ही तमाम काम निपटा लिया जाए। चूंकि अब किसी भी सवाल का जवाब तुरंत मिल जाता है, इसलिए मुख्य कौशल अब ‘तथ्यों को जानने’ से बदल कर ‘सही और गहरे सवाल पूछने’ का होना चाहिए।
इस समय भारत की ए.आई. शिक्षा संबंधी महत्वाकांक्षाएं डिजिटल बुनियादी ढांचे की कमी, शिक्षकों के अपर्याप्त प्रशिक्षण और ऐसे ए.आई. टूल्स से टकरा रही हैं। अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा के अनुसार अगर हम बच्चों को कंप्यूटिंग और ए.आई. तक पहुंच नहीं दे पाए, तो लाखों बच्चे ऐसे कौशल के बिना बड़े होंगे, जो ए.आई. द्वारा संचालित दुनिया में आगे बढऩे के लिए जरूरी है। उनकी यह चिंता सही है। भारत में लगभग 25 करोड़ स्कूली बच्चे हैं, जिन पर अगले कुछ दशकों में अमीर बनने का भारत का सपना टिका है। परंतु उन्हें वे साधन या सुविधाएं नहीं मिल रहीं, जिनसे यह सपना सच हो सके।आज भी एक-तिहाई से अधिक स्कूलों में बुनियादी डिजिटल सुविधाएं नहीं हैं। केवल 63 प्रतिशत स्कूलों में काम करने की स्थिति वाले कम्प्यूटर हैं और 67 प्रतिशत में इंटरनैट की सुविधा है।
1999 में शिक्षा सिद्धांतकार सुगाता मित्रा व एक कौशल विकास कंपनी की टीम ने दिल्ली में एक झुग्गी-बस्ती से सटी अपने दफ्तर की दीवार में छेद करके वहां एक डैस्कटॉप कम्प्यूटर, एक टचपैड व इंटरनैट कनैक्शन लगा दिया। देखते ही देखते, जिज्ञासु बच्चों ने समझ लिया कि मशीन को कैसे चलाना है और इंटरनैट का इस्तेमाल कैसे करना है। 6 महीनों में ही वे गेम, संगीत और वीडियो डाऊनलोड करना सीख गए। इससे सिद्ध हुआ कि बुनियादी ढांचा मिल जाए तो बच्चे स्वत: सीखना शुरू कर सकते हैं। उस प्रयोग के 27 वर्ष बाद, आज भी कई लोगों के लिए कम्प्यूटिंग के बुनियादी ढांचे तक पहुंच पाना सपना ही बना हुआ है। 1150 छात्रों वाले एक सरकारी स्कूल की कम्प्यूटर लैब में केवल 12 पुराने और अधिकांश खराब हो चुके कम्प्यूटर ही हैं। दुनिया की सबसे बड़ी टैक कंपनियों को विशेषज्ञ देने और सॉफ्टवेयर सेवाओं के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक भारत के लिए ऐसे हालात एक परस्पर विरोधी बात है, क्योंकि उच्च शिक्षा की तुलना में, स्कूली शिक्षा में बहुत कम निवेश करने के कारण सरकार स्कूली छात्रों को पर्याप्त शैक्षिक बुनियादी ढांचा देने में पीछे रह गई।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई लोगों का मानना है कि भारत के बच्चों को ए.आई. सिखाने के लक्ष्य में एक बड़ी चुनौती एक करोड़ शिक्षकों को तैयार करना भी है। भारत के कई राज्यों में प्राइमरी कक्षाओं से ही अंग्रेजी पढ़ाना शुरू कर दिया जाता है लेकिन अक्सर शिक्षक इसे पढ़ाने में सहज नहीं होते और बच्चों के आसपास के माहौल में भी अंग्रेजी का बहुत कम इस्तेमाल होता है, जबकि सीखने में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश ए.आई. टूल मुख्य रूप से अंग्रेजी में ही हैं। यदि भारत ए.आई. के इस दौर में अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता (डैमोग्राफिक डिविडैंड) का पूरा लाभ उठाना चाहता है, तो उसे शिक्षा के पूरे ढांचे में निवेश करना होगा।