Edited By ,Updated: 20 Feb, 2026 04:56 AM

जब भी चुनाव निकट आते हैं, राजनीतिक पाॢटयां मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘फ्रीबीज’ (मुफ्त की रेवडिय़ां) का पिटारा खोल देती हैं। इसकी बड़े पैमाने पर शुरूआत तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने की थी और तब से यह क्रम देश में हर आने वाले चुनाव के साथ-साथ...
जब भी चुनाव निकट आते हैं, राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘फ्रीबीज’ (मुफ्त की रेवडिय़ां) का पिटारा खोल देती हैं। इसकी बड़े पैमाने पर शुरूआत तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने की थी और तब से यह क्रम देश में हर आने वाले चुनाव के साथ-साथ बढ़ता ही जा रहा है। इस वर्ष 4 राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की विधानसभाओं का कार्यकाल क्रमश: 20, 23, 10 और 7 मई को तथा केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी का 15 जून को समाप्त हो रहा है। इन राज्यों में अप्रैल में चुनाव करवाए जाने की संभावना है, जिसके कार्यक्रम की घोषणा मार्च के मध्य में की जाएगी।
इस बीच विभिन्न राज्य सरकारों ने मतदाताओं के लिए लोक लुभावन घोषणाओं की शुरूआत कर दी है। सबसे पहले पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने महिलाओं, युवाओं और सरकारी कर्मचारियों के लिए कई बड़ी घोषणाएं की हैं। इनमें ‘लक्ष्मी भंडार योजना’ के अंतर्गत महिलाओं को मिलने वाली मासिक सहायता राशि बढ़ाने तथा ‘बांग्लार युवा साथी योजना’ के अंतर्गत बेरोजगार युवाओं को प्रतिमाह भत्ता देना आदि शामिल हैं। इसी बीच तमिलनाडु सरकार ने चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से कुछ ही समय पहले कुछ समुदायों के लिए मुफ्त बिजली देने की योजना की घोषणा की है जिसे बिजली सप्लाई करने वाली कम्पनी ‘तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कार्पोरेशन लिमिटेड’ ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा है कि इससे उस पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ‘सूर्यकांत’ की अगुवाई में जस्टिस ‘जायमाल्या बागची’ और जस्टिस ‘विपुल एम. पंचोली’ की बैंच ने ‘फ्रीबीज’ पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि :
‘‘यदि सरकार लोगों को सुबह से शाम तक मुफ्त बिजली, भोजन और गैस देती रहेगी तो लोग काम क्यों करेंगे? इस तरह तो काम करने की आदत ही खत्म हो जाएगी। इसलिए सरकार को रोजगार देने पर फोकस करना चाहिए। गरीबों की मदद करना समझ आता है, लेकिन उपभोक्ताओं की आॢथक स्थिति में फर्क किए बिना सब को मुफ्त सुविधा देना सही नहीं है।’’
‘‘कुछ लोग शिक्षा या बुनियादी सुविधाएं अफोर्ड नहीं कर सकते। उन्हें सुविधा देना राज्य का कत्र्तव्य है लेकिन ‘फ्रीबीज’ उनकी जेब में जा रहे हैं जो पहले ही मजे कर रहे हैं। क्या इस पर सरकारों को ध्यान नहीं देना चाहिए?’’
‘‘देश के अधिकांश राज्य राजस्व घाटे में होने पर भी विकास की उपेक्षा करके मुफ्त की घोषणाएं कर रहे हैं। सरकारें मुफ्त की सुविधाएं देती रहेंगी तो इनका खर्च कौन उठाएगा? अंतत: ‘फ्रीबीज’ का बोझ करदाताओंं पर ही पड़ेगा। अत: देश के आॢथक विकास में बाधा डालने वाली ऐसी नीतियों पर पुर्नविचार करने का समय आ गया है।’’
‘‘हमें ऐसे राज्य की जानकारी है, जहां फ्री बिजली है, भले ही आप बड़े लैंडलार्ड हों। यह टैक्स का पैसा है। हम सिर्फ तमिलनाडु के बारे में ही बात नहीं कर रहे। हम यह पूछना चाहते हैं कि इलैक्शन से ठीक पहले योजनाओं की घोषणा क्यों की जा रही है?’’
इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को यह निर्देश दिया है कि वह ‘अंतिम मिनट पर बिजली सप्लाई योजना’ की घोषणा के समय तथा इसके पीछे के वित्तीय तर्क के बारे में स्पष्टीकरण दे। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यों को लोक लुभावन योजनाओं की घोषणा से पूर्व वित्तीय नियोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि राजस्व घाटा इस हद तक न बढ़ जाए कि राष्ट्रीय आर्थिक विकास प्रभावित हो। अदालत अब इस बात की जांच करेगी कि राज्यों की कल्याणकारी योजनाओं और देश की आॢथक सेहत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मुफ्त की रेवडिय़ों के संबंध में सुप्रीमकोर्ट का उक्त आदेश किसी टिप्पणी का मोहताज नहीं। इस पर तमिलनाडु सरकार को ही नहीं, अन्य राज्य सरकारों को भी गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।—विजय कुमार