Edited By ,Updated: 28 Oct, 2026 06:18 PM

भूटान पर्यटन विभाग की वैबसाइट पर लिखा है - Bhutan -Believe। इसका अर्थ जानने की उत्सुकता होती है न? कि विश्वास किस पर और कैसे, किसलिए? इसका जवाब देती हैं पूरे भूटान की खूबसूरती को बढ़ाती उसकी निर्मल स्वच्छ हवा में फहराती हुई प्रार्थना-पताकाएं।
अकु श्रीवास्तव : भूटान पर्यटन विभाग की वैबसाइट पर लिखा है - Bhutan -Believe। इसका अर्थ जानने की उत्सुकता होती है न? कि विश्वास किस पर और कैसे, किसलिए? इसका जवाब देती हैं पूरे भूटान की खूबसूरती को बढ़ाती उसकी निर्मल स्वच्छ हवा में फहराती हुई प्रार्थना-पताकाएं।
कभी रंगबिरंगी, कहीं कहीं सफेद। एक लंबी रस्सी पर टंकी हुई तो कभी लंबे स्तम्भ-समूह में निर्बाध फडफ़ड़ाती हुईं। पहली दृष्टि में तो इनकी सुंदरता बांध लेती है लेकिन जब इनके अर्थ को समझने की चेष्टा की तो 'विश्वास' की नई परतें खुलने लगीं। ये केवल रंगबिरंगी झंडियां नहीं हैं, इन्हें 'धार' कहते हैं। इनके आकार चौकोर तथा लम्बवत होते हैं। इनके 5 रंग पंचतत्वों के प्रतीक हैं- श्वेत सौभाग्य हेतु तथा बुरे कर्मों की शुद्धि के लिए नीला (आकाश)। स्वास्थ्य तथा लम्बी आयु के लिए पीला और बाधाओं पर विजय के लिए हरा। लाल इच्छापूर्ति के लिए।
उनके चारों ओर टाइगर, गरुण तथा ड्रैगन की आकृति होती है और होते हैं प्रत्येक रंग और तत्व से एवं बोधिसत्व/तारा से जुड़े लगभग 400 मंत्र जो एथिक्स, बुद्धि, संतोष, धैर्य, परिश्रम, संयम और त्याग की भावना जगाते हैं अपितु अहंकार, ईष्र्या, लोभ, अज्ञान तथा आक्रामकता जैसे विषों का शमन भी करते हैं। ये खुले स्थानों जैसे ऊंचे टीलों, मठों, नदी तटों, मठों इत्यादि खुले स्थानों पर स्थापित की जाती हैं। विश्वास है कि इन पताकाओं को लगाने वाला तो इन मंत्रों द्वारा की गई प्रार्थनाओं से लाभान्वित होता ही है, इनके फडफ़ड़ाने से इनके संसर्ग (वायु द्वारा) में आने से प्रत्येक जीवन आशीष पाता है।
भूटान की पहचान का एक हिस्सा हैं पताकाएं
कई बार घरों के ऊपर एक अकेला श्वेत धार स्थापित होता है जिसमें हरे, लाल, नीले और पीले रंगों के छोटे छोटे रिबन लगे होते हैं। जो लहराकर वहां निवास करने वाले परिवार को कल्याण, समृद्धि तथा सौहार्द का आशीष देते हैं। मंदिरों मठों आदि में भी इन्हीं रंगों से निर्मित टाईनुमा टुकड़ों से निर्मित एक गोलाकार लम्बी आकृति छत से लटकी होती है जिसे बुराई पर विजय के प्रतीक के रूप में धार्मिक जुलूसों में भी लेकर चला जाता है।
दूसरी ओर श्वेत धार मृतात्माओं की स्मृति में लगाए जाते हैं। यहां भी यही विश्वास है कि हमारे पूर्वज कहीं जाते नहीं हैं। हम पर सदा उनकी दृष्टि रहती है और वे हमारे कल्याण के लिए सजग रहते हैं। श्वेत पताकाएं लहरा-लहरा कर हमें अच्छे आचरण और विचारों के लिए सचेत करती रहती हैं- ऐसा विश्वास है। पूरा भूटान ऐसी ही पताकाओं के अटा पड़ा है। ये पताकाएं नहीं तो भूटान की पहचान का एक हिस्सा ही नदारद हो जाएगा।
पहाड़ों की छोटी-छोटी दरारों में अनगिनत 'मिनी-स्तूप'
यही नहीं, जैसा कि किसी भी पहाड़ी मार्ग में होता है, भूटान में भी आपको पहाड़ी रास्तों में एक तरफ खाई और दूसरी तरफ पहाड़ों की दीवार मिलेगी। यहां पहाड़ों की छोटी-छोटी दरारों में अनगिनत 'मिनी-स्तूप' रखे दिखेंगे। मात्र 2 इंच ऊंचे, गोल पेंदे और ऊपर से कोणाकार ये छोटे स्तूप गुफाओं, पहाड़ों, चट्टानों, सड़क के मोड़ों और बड़े स्तूपों के आसपास रखे जाते हैं।
कभी-कभी तो लगता है कि हम भारतीयों के लिए भूटान ही एक सही मित्र देश की भूमिका में उभरता है। हो भी क्यों न! सर्वाधिक पर्यटक भी भारत से ही आते हैं। भूटान के जीवन में भारतीय हैं। खानपान और वेशभूषा को छोड़ दिया जाए तो काफी कुछ भारतीय। और तो और भारतीय फिल्मों, वैब सीरीज और सीरियलों ने उन्हें दीवाना बना रखा है। उनका अपना सिनेमा अभी शैशवावस्था में है, उसे बढ़ावा देने के लिए सिनेमाघरों में केवल भूटानी भाषा 'जोंगखा' की फिल्में ही दिखाई जाती हैं लेकिन इंटरनैट जिन्दाबाद।
संभवत: यही कारण है कि पर्यटक को भूटान में अंग्रेजी अथवा उनकी भाषा का ज्ञान न भी हो तो भी काम चलता है क्योंकि लगभग हर भूटानी जिसे अपना धंधा चलाना है हिन्दी बोलता-समझता है। थिम्पू में तो हमें बाकायदा एक बोर्ड पर 'जलेबी' लिखा दिखा। यह एक अस्पताल के गेट पर टंगा बोर्ड था। भारत के सहयोग वाले इस अस्पताल को चलाने में भारतीय सेना का भी योगदान है। लेकिन इसकी कैंटीन का नाम जलेबी था। यहां जलेबी, समोसा और छोले भटूरे के लिए बाकायदा लंबी लाइन दिखी। जलेबी थी भी सस्ती, 200 रुपए किलो। भारत में शायद ही इस भाव पर मिलती होगी। भूटान की टैक्सटाइल और कॉटेज इंडस्ट्री भी उफान पर है। हाथ से बुने कपड़ों की मांग पर्याप्त रहती है और उसका निर्यात भी होता है।
मातृसत्तात्मक भूटान में कोई महिला ऐसी नहीं दिखेगी जो काम नहीं कर रही हो। संस्कृति के बचाव, पहनावे से लेकर दुकानों में उनकी ही अधिकता दिखेगी। यहां शादियां भी अब देर से होने लगी हैं... और कई परिवारों में युवतियां शादी में रुचि भी नहीं रखतीं। (यह पूरी दुनिया का हाल है)। भूटान की प्रजनन दर 1.44 ही है जो कि सामान्य आबादी बनी रहे, के लिए जरूरी 2.1 से काफी नीचे है। हां, सरकार की ओर से ज्यादा बच्चे पैदा करने को लेकर प्रोत्साहित किया जाता है। हमें बताया गया कि 3 से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर महिला को 3 साल तक 10 हजार भूटानी न्गुल्ट्रम (रुपए) महीना दिया जाता है।
24 घंटे तक कोई शुल्क नहीं
भारत से 'फूएंटशोङ्क्षलग' (भारत-भूटान बॉर्डर पर स्थित जयगांव के रास्ते) जाने वाले भारतीय को 24 घंटे तक 'फूएंटशोङ्क्षलग' में रहना नि:शुल्क है लेकिन उसके आगे और 24 घंटे के बाद प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 1200 रुपए का शुल्क पहले ही अदा करना होता है। भारतीय नंबर की गाडिय़ों को भी 24 घंटे के बाद संभवत: 3000 रुपए प्रतिदिन अदा करना होता है। और हां, एक अच्छी बात यह है कि आप यह भुगतान भारतीय मुद्रा में कर सकते हैं, नकद और यू.पी.आई. भी खूब चलता है। यू.पी.आई. भुगतान सुविधा भारत में भूटानियों को भी अब उपलब्ध हो गई है। भूटानी मुद्रा और भारतीय रुपए का मूल्य समान है।