उस पीढ़ी को श्रद्धांजलि, जिसने वास्तविकता में जीवन जिया "

Edited By Updated: 25 Oct, 2026 05:19 AM

a tribute to the generation that lived life in reality

कल्पना कीजिए-यह 1988 की मई की चिलचिलाती दोपहर है। छत का पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा है, जिससे लगातार खट-खट की आवाज आ रही है। न तो एयर कंडीशनिंग है, न किसी के हाथ में स्मार्टफोन, न ही कान बंद हैं और न ही कोई स्ट्रीमिंग सेवा उपलब्ध है। बच्चों का एक...

कल्पना कीजिए-यह 1988 की मई की चिलचिलाती दोपहर है। छत का पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा है, जिससे लगातार खट-खट की आवाज आ रही है। न तो एयर कंडीशनिंग है, न किसी के हाथ में स्मार्टफोन, न ही कान बंद हैं और न ही कोई स्ट्रीमिंग सेवा उपलब्ध है। बच्चों का एक समूह ठंडे टेराजो के फर्श पर शर्बत के एक पीतल के जग के चारों ओर घेरा बनाकर बैठा है। एक बच्चा ध्यान से कॉमिक बुक का पन्ना पलट रहा है, दूसरा एक पाठ्यपुस्तक के अंदर मोर का पंख संतुलित करने की कोशिश कर रहा है और बाहर, एक आइसक्रीम विक्रेता की विशिष्ट आवाज शांत गली में गूंज रही है।

उस पल को कैमरे में कैद करने वाले कोई फोन नहीं थे। कोई वीडियो क्लिप मौजूद नहीं है। सोशल मीडिया पर कोई स्टोरी पोस्ट नहीं की गई। फिर भी, आज उस कमरे में बैठे किसी भी व्यक्ति से पूछिए-जो अब 40 या 60 वर्ष की आयु के आसपास हैं-और वे पर्दे के सटीक रंग, पहली बारिश के बाद गीली मिट्टी की गंध और हवा में गूंजती हंसी का सटीक वर्णन कर सकते हैं। 1960 और 1982 के बीच जन्मी यह पीढ़ी इतिहास में एक अनूठा स्थान रखती है। ये वे अंतिम मानव हैं, जिनका बचपन पूरी तरह से रिकॉर्डहीन और बिना किसी रोक-टोक के बीता और वे पहले ऐसे लोग हैं जिन्होंने अति-संबद्ध डिजिटल युग में कदम रखा। अगर आप इस पीढ़ी के पुराने लकड़ी के बक्सों या धूल से भरी स्टील की अलमारियों को देखें, तो आपको उनमें हजारों हाई-डैफिनिशन तस्वीरें या डिजिटल वीडियो आर्काइव नहीं मिलेंगे। पारिवारिक फोटो एल्बम पतले होते थे, जिनमें शायद एक दर्जन ब्लैक-एंड-व्हाइट या धुंधली सेपिया स्टूडियो तस्वीरें होती थीं। स्कूल के दिनों, गर्मियों की छुट्टियों और पड़ोस के खेलों की उनकी यादें बेहद जीवंत और समृद्ध हैं। उन्हें अपने सबसे खुशी के पलों को सहेजने के लिए क्लाऊड स्टोरेज की जरूरत नहीं थी।

ऑनलाइन स्ट्रीमिंग और तुरंत ट्रेलर आने से पहले के जमाने में, सिनेमा एक पवित्र अनुभव हुआ करता था। किसी सिंगल-स्क्रीन थिएटर में ‘पहले दिन, पहले शो’ का टिकट पाना एक सम्मान की बात थी, जिसके लिए सैन्य स्तर की योजना बनानी पड़ती थी, घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना और धक्का-मुक्की करते हुए आगे बढऩा पड़ता था। जैसे ही हॉल की बत्तियां मंद होतीं और शुरुआती क्रैडिट्स चलने लगते, पूरा थिएटर जोश से भर उठता था। जब थिएटर के टिकट पहुंच से बाहर हो गए, तो सप्ताहांत में वी.सी.आर. किराए पर लेना मोहल्ले का एक उत्सव बन गया। परिवार और पड़ोसी एक ही बैठक कक्ष में इकट्ठा होकर लगातार चार फिल्में देखते थे, जब तक कि उनकी आंखें दुखने न लगें और वे केवल घर के बने नाश्ते और सामूहिक आनंद से ही अपना पेट भरते थे।

उस दौर का सामाजिक ताना-बाना अटूट विश्वास और खुले दिल से कायम था। निजता एक ऐसी अवधारणा थी जिसके बारे में कोई सोचता, समझता या परवाह नहीं करता था। दोपहर 2 बजे बिना बताए पड़ोसी के घर चले जाना असभ्य नहीं माना जाता था, यह सामान्य बात थी। अगर दोपहर का खाना परोसे जाने के समय आप बाहर खेल रहे होते, तो बिना सोचे-समझे किसी दोस्त के घर जाकर खाना खा लेते। दोस्ती बेहद सच्ची होती थी। और अगर दोपहर के बीच में किसी दोस्त के पिता स्कूल के गेट के पास दिखाई देते, तो यह सबसे बड़ी खबर होती थी। बच्चे धूल भरे खेल के मैदान में दौड़ते हुए चिल्लाते, ‘‘तेरे पापा आए हैं, देख!’’ -यह वाक्य सुनते ही दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं। 

हर साल जून में पाठ्यपुस्तकों को भूरे कागज में लपेटना एक वार्षिक परंपरा थी जिसे त्यौहार की तरह मनाया जाता था। साइकिलें अनमोल वस्तुएं थीं, और ‘ट्रिपल सीट’ यानी एक व्यक्ति हैंडल पर, एक फ्रेम पर और एक कैरियर से चिपके हुए साइकिल चलाना किशोरावस्था की स्वतंत्रता की चरम अभिव्यक्ति थी। फिर भी, वही पीढ़ी आज भी बाजार में उन सेवानिवृत्त शिक्षकों को देखते ही सहज रूप से उनके पैर छूने के लिए झुक जाती है। स्नेह का इजहार शब्दों में बहुत कम होता था। कोई भी अपने माता-पिता से ‘आई लव यू’ नहीं कहता था, क्योंकि भावनात्मक भाषा टी.वी. कॉमेडी से नहीं सीखी जाती थी।

प्यार को कार्यों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था-एक मां अपने बच्चे के लिए फल का सबसे मीठा टुकड़ा बचाकर रखती थी, एक पिता चुपचाप मूसलाधार बारिश में साइकिल चलाकर दवा खरीदने जाता था, या दोस्त एक पुलिया पर पूरी खामोशी से एक साथ बैठे रहते थे, बस एक-दूसरे की उपस्थिति में संतुष्ट रहते थे। आज, जब यह पीढ़ी घर के लोन, स्वास्थ्य जांच और धीमी वाई-फाई स्पीड, ऑनलाइन डिलीवरी में देरी और ऐसी ही कई शिकायतों को लेकर परेशान किशोरों को संभाल रही है, तो वे अतीत को कड़वाहट से नहीं, बल्कि गहरी, शांत कृतज्ञता से याद करते हैं। ऐसी दुनिया में, जहां आधुनिक रिश्ते थोड़ी सी भी अनबन होने पर टूट जाते हैं या स्क्रीन के पीछे खो जाते हैं, वहीं इस पीढ़ी द्वारा बनाए गए संबंध आज भी कायम हैं। 

उन्होंने एक ऐसे दौर में जीवन बिताया जब संसाधन सीमित थे, पर समय और स्नेह प्रचुर मात्रा में थे। यादें चिप्स में संग्रहित नहीं होती थीं, बल्कि आत्मा में गहराई से अंकित होती थीं। वे दो युगों के बीच सेतु बने हुए हैं, एक जीवंत उदाहरण है कि सबसे गहरे रिश्ते वास्तविकता में बनते हैं और जीवन के सबसे अच्छे पल कभी फिल्माए नहीं जाते, बल्कि केवल जिए जाते हैं।-नितिन कुलकर्णी 

Related Story

    Trending Topics

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!