Edited By ,Updated: 22 Oct, 2026 03:38 AM

विकसित भारत की ओर, भारत की यात्रा की नींव, हमारे गांवों की समृद्धि पर ही रखी जानी चाहिए। जो किसान राष्ट्र को भोजन प्रदान करता है, वह देश के आर्थिक विकास से पैदा होने वाले अवसरों में पूरे हिस्से का हकदार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में...
विकसित भारत की ओर, भारत की यात्रा की नींव, हमारे गांवों की समृद्धि पर ही रखी जानी चाहिए। जो किसान राष्ट्र को भोजन प्रदान करता है, वह देश के आर्थिक विकास से पैदा होने वाले अवसरों में पूरे हिस्से का हकदार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘अन्नदाता’ का सशक्तिकरण शासन का एक प्रमुख उद्देश्य रहा है। एग्रीवोल्टिक्स, जिसे एग्री-पीवी भी कहा जाता है, किसानों को अपनी जमीन पर खेती जारी रखते हुए स्वच्छ बिजली पैदा करने के योग्य बनाकर इस उद्देश्य को आगे ले जाने का एक बड़ा अवसर प्रदान करता है।
फोटोवोल्टिक्स संरचनाएं वायुमंडलीय मांग के चरम दौर में फसलों की कैनोपी के तापमान, वाष्पोत्सर्जन की आवश्यकता और मिट्टी की नमी के नुकसान को कम करती हैं, जिससे अनुकूल सूक्ष्म जलवायु (माइक्रो क्लाइमेट) का निर्माण होता है। वास्तव में, साल 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने की हमारी राष्ट्रीय यात्रा में भारत का कृषि क्षेत्र खेतों से सौर ऊर्जा उत्पादन का एक सशक्त मंच बनकर उभरा है। इसके साथ ही, भारत सरकार के सफल प्रयास पीएम-कुसुम (प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान) के रूप में पहले ही दिखाई दे रहे हैं, जिसने सिंचाई के सौरीकरण के माध्यम से डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी) और पर्यावरण अनुकूल टिकाऊ कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित किया है। इसके अलावा, पीएम-कुसुम के अगले चरण के तहत एग्री-फोटोवोल्टिक्स के लिए अलग प्रावधान बनाकर सौर ऊर्जा उत्पादन को गति देने के प्रयास किए जा रहे हैं।
23 अक्तूबर, 2026 तक भारत नई दिल्ली के भारत मंडपम में 7वें एग्रीवोल्टिक्स विश्व शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। इसका विषय, पावरिंग द ग्लोबल साऊथ सीधे तौर पर उस जिम्मेदारी को रेखांकित करता है जिसे निभाने के लिए भारत तत्पर है। हम चाहते हैं कि कृषि नवाचार और ऊर्जा परिवर्तन के लाभ उन छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंचें, जो भारत के कुल किसानों का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा हैं। यह सम्मेलन एक ऐसा दृष्टिकोण तैयार करने में मदद कर सकता है जो भारत के गांवों की सेवा करे और दुनिया भर के विकासशील देशों को व्यावहारिक अनुभव प्रदान करे।
हमारे लिए प्रस्थान बिंदू किसान की आजीविका है। हर फसल के पीछे महीनों की मेहनत, लगाई गई पूंजी और एक पूरे परिवार की आशाएं जुड़ी होती हैं। अच्छी फसल का मतलब हमेशा अच्छी आमदनी नहीं होता। मौसम, कृषि लागत और बाजार की कीमतें घरेलू बजट को अस्थिर कर सकती हैं। लोक नीति को किसानों को इन अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए समर्थ बनाना चाहिए और उनकी कमाई के अतिरिक्त अवसर पैदा करने चाहिएं। वहीं पर कृषि और नवीकरणीय ऊर्जा नीति का मेल होता है। एग्रीवोल्टिक्स खेती के अनुकूल संरचनाओं और दूरियों के माध्यम से एक ही जमीन पर खेती और सौर उत्पादन दोनों को जोड़ता है। यह किसान को बिजली से राजस्व का एक अतिरिक्त स्रोत प्रदान कर सकता है।
जहां सौर ऊर्जा डीजल या खरीदी गई बिजली की जगह लेगी, वहां यह लागत भी घटा सकता है। एग्री-पीवी के तहत बनने वाला अनुकूल सूक्ष्म जलवायु बहुत अधिक गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस), सूखे, बहुत अधिक सौर विकिरण और ओलावृष्टि के खिलाफ अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है। अन्नदाता के ‘ऊर्जादाता’ बनने की संभावना एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देती है- किसान को भारत की ऊर्जा संपदा के सृजन में हिस्सा लेना चाहिए और उससे लाभान्वित भी होना चाहिए। एग्रीवोल्टिक्स भारत के खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के लक्ष्यों को सहजता से एक साथ जोड़ सकता है, जिससे एक ही जमीन राष्ट्र का पोषण भी कर सकेगी और उसके भविष्य को ऊर्जा भी दे सकेगी।
यह महत्वाकांक्षा ‘आत्मनिर्भर भारत’ के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के विस्तार ने यह सिद्ध किया है कि जब नीतियां निवेशकों को विश्वास दिलाती हैं और नवाचार को प्रोत्साहित करती हैं, तो निरंतर राजनीतिक नेतृत्व क्या हासिल कर सकता है। घरेलू विनिर्माण, पारदर्शी खरीद और ऊर्जा बुनियादी ढांचे में निवेश ने आगे के विकास की नींव रखने में मदद की है। एग्रीवोल्टिक्स इन अवसरों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में और अधिक विस्तार दे सकता है, जिसमें स्थापना, रखरखाव और कृषि सेवाओं से जुड़े रोजगार शामिल हैं।
विकास को लेकर हमारी सरकार का दृष्टिकोण हमें इन अवसरों को आपस में जोडऩे की जिम्मेदारी देता है। भारत में एग्रीवोल्टिक्स को सफलतापूर्वक अपनाने के लिए फसलों का सही चयन प्राथमिक शर्तों में से एक है। इसलिए फसलों के चयन में शेड टॉलरेंस (छाया सहनशीलता), रूपात्मक अनुकूलता (मॉर्फोलॉजिकल प्लास्टिसिटी), और रुक-रुक कर मिलने वाले विकिरण में स्थिर उत्पादकता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उत्पादकता बनाए रखने के लिए उचित कृषि प्रबंधन जैसे पंक्तियों के बीच बुआई, पर्याप्त सिंचाई और पोषक तत्वों की आपूर्ति तथा उचित फसल चक्र अनिवार्य है।
एग्रीवोल्टिक्स डिजाइनों का सामान्य लक्ष्य फसल की कैनोपी तक लगभग 70 प्रतिशत या उससे अधिक प्राकृतिक विकिरण बनाए रखना होना चाहिए, जबकि एडजस्टेबल पीवी पैनल विकिरण-संवेदनशील वृद्धि चरणों के दौरान अतिरिक्त लचीलापन प्रदान कर सकते हैं। एक गांव को उत्पादक खेतों, भरोसेमंद ऊर्जा और बाजारों तक पहुंच की आवश्यकता होती है। इसलिए कृषि और ऊर्जा विभागों को राज्य सरकारों, अनुसंधान संस्थानों और स्थानीय संस्थाओं के साथ मिलकर योजना बनानी चाहिए। किसान इन सभी फैसलों के परिणामों को अपनी एक ही जोत पर अनुभव करता है, हमारे संस्थानों को भी इसी एकजुटता की भावना के साथ काम करने में समर्थ होना चाहिए। एग्रीवोल्टिक्स का राजनीतिक आधार इस बात पर टिका है कि विकास से किसे लाभ मिलता है। ऊर्जा सुरक्षा में वृद्धि से ग्रामीण रोज़ी-रोटी को मजबूती मिलनी चाहिए। स्वच्छ तकनीक में निवेश से गांवों के किसानों और युवाओं के लिए अवसर पैदा होने चाहिएं।
जब हम नई दिल्ली में विश्व का स्वागत कर रहे हैं, तो हमारी आशाएं व्यावहारिक हैं। इन चर्चाओं से बेहतर परखे गए प्रोजैक्टों, ज्ञान सांझा करने वाली सांझेदारियों और ऐसी कारोबारी व्यवस्थाओं को विकसित होना चाहिए जिन पर किसान भरोसा कर सकें। ‘विकसित भारत’ तभी आगे बढ़ेगा जब छोटे किसानों के पास समृद्धि के नए स्रोतों में हिस्सा लेने का विश्वास और साधन होंगे। एग्रीवोल्टिक्स कृषि को अपनी नींव और अन्नदाता को अपने केंद्र में रखकर इस लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।-प्रह्लाद जोशी व शिवराज सिंह चौहान(लेखक केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री हैं।)