Edited By ,Updated: 16 Oct, 2026 05:38 AM

भारत के विरुद्ध भ्रम फैलाने वाले विदेशी संगठनों को यह अधिकार कतई नहीं है कि वे विदेश में बैठकर भारत में हो रहे आन्दोलन पर टिप्पणी करें और बिना मांगे सलाह दें। कम से कम उन संगठनों को तो बिल्कुल भी नहीं, जिनकी कार्यप्रणाली और मंशा प्राय: संदिग्ध और...
भारत के विरुद्ध भ्रम फैलाने वाले विदेशी संगठनों को यह अधिकार कतई नहीं है कि वे विदेश में बैठकर भारत में हो रहे आन्दोलन पर टिप्पणी करें और बिना मांगे सलाह दें। कम से कम उन संगठनों को तो बिल्कुल भी नहीं, जिनकी कार्यप्रणाली और मंशा प्राय: संदिग्ध और पूरी तरह से एकतरफा होती है। इससे भी बड़ी और समझने वाली बात यह है कि ऐसे संगठन न तो भारत के बारे में पूरी तरह से जानते हैं और न ही उनको भारत को लेकर कुछ जानकारी होती है। हद तो तब हो जाती है जब वे बिना जांचे-परखे, व्यवस्था पर उंगली उठाने लगते हैं। निश्चित रूप से इनकी मंशा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को खराब दिखाने की होती है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय यानी ओ.एच.सी.एच.आर. की टिप्पणी इन दिनों बेहद चर्चा में है। इसने हाल ही में दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर प्रदर्शनकारियों की सामूहिक गिरफ्तारी और उनकी हिरासत पर ङ्क्षचता जताई और बयान जारी किए। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों, वकीलों, पत्रकारों और सिविल सोसायटी के लोगों को हिरासत में लिए जाने की विदेश में बैठे संगठन की पूर्वाग्रहों से ग्रसित ङ्क्षचताएं यकीनन भारत के अन्दरूनी मामलों में दखल से कम नहीं हैं।
ओ.एच.सी.एच.आर. ने विरोध-प्रदर्शनों से पहले और प्रदर्शन के दौरान बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियों पर दिखावटी आंसू भी बहाए, जो गलत है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रवक्ता थामीन अल खीतान ने एक बयान में कहा था कि हम भारतीय अधिकारियों से कहना चाहेंगे कि वे यह बात सुनिश्चित करें कि शांतिपूर्ण सभा का अधिकार सभी को है जिसका पूरी तरह से सम्मान और पालन किया जाए। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि इस मसले पर दोनों पक्षों को सार्थक संवाद में शामिल होना चाहिए। जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारतीय दूतावास ने संयुक्त राष्ट्र की चिंताओं को गलत बताकर इस अपील को पूरी तरह से न केवल खारिज कर दिया, बल्कि इसे भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप और दखल बताया।
भारत ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यानी ओ.एच.सी.एच.आर. को निष्पक्षता और गैर-चयनात्मकता के अनुरूप, अन्य देशों में हो रहे बड़े पैमाने के विरोध प्रदर्शनों पर भी ध्यान देना चाहिए। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त है और सशक्त संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया द्वारा संरक्षित है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि हर लोकतंत्र की तरह भारतीय नागरिक, सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए धरना, प्रदर्शनों के ऐसे अधिकार का प्रयोग करते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि अधिकारी कानून के अनुसार कार्य करते हैं और किसी भी शिकायत के निवारण के लिए न्यायालय सबके लिए उपलब्ध है।
विदेश मंत्रालय का कहना है कि जिस तरह की टिप्पणी की गई है उससे दोहरे मापदण्ड के चलते बहुपक्षीय संस्थानों पर वैश्विक विश्वास कमजोर होता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की टिप्पणी न केवल अनुचित और अस्वीकार्य है बल्कि ऐसी टिप्पणियां भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप भी हैं, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में विरोध-प्रदर्शनों तथा कानून प्रवर्तन की कार्रवाई पर चुप्पी रख ऐसी टिप्पणियां या रिपोर्टें क्यों नहीं जारी की जातीं। विदेश मंत्रालय का मानना है कि अगर विदेशी हस्तक्षेप या बयान ऐसे ही चलते रहे, तो बहुपक्षवाद में लोगों का विश्वास कम होगा। साथ ही, इससे एक संगठन के रूप में बयानवीरों की विश्वसनीयता भी कमजोर होती है।
भारत जैसी उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति अपनी संप्रभुता, स्वतंत्र न्यायिक प्रणाली और सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी बाहरी उपदेश या चयनात्मक दबाव को स्वीकार करने की न तो पक्षधर है और न ही होगी। ऐसे संस्थानों-संगठनों को भारत को लेकर टिप्पणी करने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। निश्चित रूप से कहीं न कहीं यह पश्चिम की झुंझलाहट-बौखलाहट है, जो भारत को एक विश्व शक्ति बनते हुए देखने से ईष्र्या की आहट से कम नहीं है।-ऋतुपर्ण दवे