Edited By ,Updated: 02 Nov, 2026 02:48 PM

हमें बताया गया कि भूटानी भोजन में अधिक मसाले नहीं डाले जाते। केवल नमक और हल्दी, बहुत हुआ तो छोंकने के लिए जीरा। लेकिन छतों पर ढेर की ढेर सूखती लाल-लाल मिर्चें, इसकी चुगली खाती हैं।
हमें बताया गया कि भूटानी भोजन में अधिक मसाले नहीं डाले जाते। केवल नमक और हल्दी, बहुत हुआ तो छोंकने के लिए जीरा। लेकिन छतों पर ढेर की ढेर सूखती लाल-लाल मिर्चें, इसकी चुगली खाती हैं। दरअसल वे अधिक मसाले नहीं खाते लेकिन जब मिर्च खाने की बारी आती है! उफ? तौबा!!! चिली चीज करी - हमने कहने को चखी लेकिन नानी याद आ गई। हां, उनकी ‘बटर-टी’ को कुरकुरे भुने पोहे के साथ सुडक़ना अच्छा लगा। भूटान के लोग लाल और हरी मिर्च को सिर्फ मसाले के रूप में नहीं, बल्कि मुख्य सब्जी के रूप में खाते हैं।
भूटान का राष्ट्रीय व्यंजन ‘एमा दात्शी’ है, जो मुख्य रूप से लाल/हरी मिर्च और मुलायम पनीर से बनाया जाता है। इसमें मिर्च को स्वाद बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी मात्रा में सब्जी की तरह डाला जाता है। भूटान एक ठंडा हिमालयी क्षेत्र है। पारंपरिक रूप से ऐसा माना जाता है कि तीखी और गर्म मिर्च खाने से शरीर को अंदर से गर्मी और ऊर्जा मिलती है।
बच्चों को बहुत कम उम्र से ही खाने में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में मिर्च दी जाती है और धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ाई जाती है, जिससे उन्हें तीखा खाने का अभ्यास हो जाता है।
ज्यादातर भूटानी मांसाहारी हैं। स्थानीय लोग विनोद में कहते हैं कि बौद्ध धर्म अङ्क्षहसा को विशेष तौर पर मानता है, सब जीवों पर दया भाव रखता है परंतु मांस खाने की मनाही कहीं लिखित में नहीं है इसलिए हम लोग सब खाते हैं, मठ के भिक्षु भी। भूटान के वातावरण के तो हम पहले ही दिन से दीवाने ही हो गए लेकिन यहां के लोगों में स्वच्छता के लिए जागरूकता अपने आप में अलग थी। शाम होते ही हर जगह एक निश्चित वक्त पर कारपोरेशन की गाड़ी पहुंच जाती थी और सब व्यावसायिक संस्थान तथा दुकान वाले अपनी टोकरी लेकर वहां पहुंच जाते हैं और वहीं पर कचरे को ‘कम्प्रैस्ड’ कर अंदर कर लिया जाता है।
रहने-ठहरने के मामले में भूटान अच्छा है लेकिन सीजन के दिनों में थोड़ी मुश्किल हो सकती है। पूरे भूटान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके पर्यटन व्यवसाय में बड़ी भूमिका निभाते हैं निजी होटल और होम स्टे आदि! छोटे सुंदर सजीले कैफे, चाय-कॉफी तथा अन्य पेय पदार्थ के साथ बेहतरीन बेकरी आइटम परोसते हैं। ज्यादातर तीन सितारा होटलों में वे सभी सुविधाएं मिल जाती हैं जो पांच सितारा में होती हैं (सिर्फ स्वीङ्क्षमग पूल का छोडक़र)।
इन होटलों में एक बात और गौरतलब लगी कि सज्जा में राज परिवार से जुड़ी तस्वीरों को कलात्मकता से प्रयोग किया गया था। लगभग समूचे भूटान में- मार्गों और दुकानों में, लोगों के सीने पर लगे बैज तक में, भूटान के राजपरिवार की तस्वीर लगी दिखेगी। लोगों में राजपरिवार के प्रति प्रेम और सम्मान की चर्चा काफी है। हमें ‘आठ महान स्तूप’ के दर्शन हुए। थिम्पू जाने वाले मार्ग पर स्थित ‘आठ महान स्तूप’ असल में भूटान के चुखा जिले के गेदु नामक स्थान पर स्थित हैं। और इसको देखने का अनुभव अलग है।
बौद्ध परंपरा में इन्हें ‘देशेग चोर्टेन ग्ये’ कहा जाता है। ये आठ स्तूप भगवान बुद्ध के जीवन की त्त् सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं और चरणों के प्रतीक के रूप में बनाए गए हैं। भूटान में इन स्तूपों को केवल पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि बुद्ध के शरीर, वाणी और मन का जीवंत रूप माना जाता है। मान्यता है कि इन स्तूपों के चारों ओर घड़ी की सुई की दिशा में परिक्रमा (कोरा) करने से नकारात्मक कर्मों का नाश होता है और असीम पुण्य की प्राप्ति होती है।
थिम्पू में घूमने के लिए काफी कुछ है। वहां का किला जरूर देखना चाहिए, साथ ही राजा का पुराना महल भी। फुटबॉल के प्रेमी इस देश में उनके स्टेडियम में फुटबॉल देखना बहुत रोचक होता है। मैमोरियल चोर्टेन स्तूप थिम्पू के दक्षिण-मध्य भाग में डोबूम लाम पर स्थित है। तीसरे द्रुक ग्यालपो जिग्मे दोरजे वांगचुक के सम्मान में क्9स्त्रब् में निर्मित, सुनहरे शिखर वाला यह स्तूप भूटान का सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल माना जाता है। यह थिम्पू के घंटाघर से बस आधा किलोमीटर की दूरी पर है।
राष्ट्रीय पशु ताकिन के लिए ‘रॉयल ताकिन प्रिजर्व’ जाना तो जरूरी ही है। किसी भी रिजर्व की देखभाल कैसे हो सकती है, यह इसका एक उत्तम उदाहरण है।
ताकिन अपनी अनोखी शारीरिक बनावट और पौराणिक मान्यताओं के कारण विशेष पहचान रखता है। इसका शरीर मजबूत, गर्दन मोटी, पैर छोटे और मांसल तथा सिर चौड़ा होता है। इसके बड़े, घुमावदार सींग होते हैं। इसके शरीर पर पीले-भूरे से सुनहरे रंग के घने बाल होते हैं, जिनसे निकलने वाला विशेष तैलीय पदार्थ पानी को दूर रखता है और उसे ठंड से बचाता है। यह पत्तियां, घास, बांस की कोपलें और फूल खाता है। ऊंची डालियों तक पहुंचने के लिए यह अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो सकता है। भूटान की लोककथा के अनुसार, तिब्बती संत लामा द्रुक्पा कुनले ने बकरी के सिर और गाय के शरीर को जोडक़र ताकिन की रचना की थी इसलिए इसे धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्व प्राप्त है। लेखक- अंकु श्रीवास्तव