बिहार परिणाम : राजनीति का नया अध्याय

Edited By Updated: 17 Nov, 2025 05:51 AM

bihar results a new chapter in politics

इस बार बिहार एक नए उजाले और बिल्कुल नए आत्मविश्वास के साथ जागा है। चुनावी नतीजों के शुरुआती रुझानों के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि जनता ने इस बार केवल वोट नहीं डाला, अपनी राजनीति की दिशा खुद तय की है। क्योंकि शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम तस्वीर...

इस बार बिहार एक नए उजाले और बिल्कुल नए आत्मविश्वास के साथ जागा है। चुनावी नतीजों के शुरुआती रुझानों के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि जनता ने इस बार केवल वोट नहीं डाला, अपनी राजनीति की दिशा खुद तय की है। क्योंकि शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम तस्वीर तक, पूरा परिदृश्य एक ही संदेश दे रहा था कि बिहार अब पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए.) ने शायद खुद भी इतनी विशाल विजय की कल्पना नहीं की थी। 243 में से 207 सीटों का प्रचंड बहुमत एन.डी.ए. को मिलना! यह जीत केवल आंकड़ों की नहीं है। यह बिहार के मतदाता के बदले हुए राजनीतिक विवेक, उसकी परिपक्वता और उसकी नई प्राथमिकताओं की पहचान है। बिहार के लोगों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अब परिवारवाद अथवा भावनात्मक नारों का नहीं, परिणाम और भरोसे का रास्ता चुन चुके हैं।

खास बात यह रही कि इस बार बिहार  ने मतदान प्रतिशत में भी इतिहास रचा। 67 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान और उसमें 71 प्रतिशत महिलाओं की धमाकेदार भागीदारी बताता है कि यह केवल चुनाव नहीं बल्कि समाज की गहराई में घट रही शांत क्रांति का उद्घोष था। गांवों और शहरों में महिलाएं बूथों पर ऐसे पहुंचीं जैसे वे अपने जीवन का नया अध्याय लिखने निकली हों। उनके वोट में योजनाओं का लाभ, सुरक्षा की अनुभूति और रोजमर्रा के जीवन में आए सुधारों का अनुभव था। पहली बार महिलाएं केवल वोटर नहीं, परिणाम की निर्णायक निर्माता बन कर उभरीं। इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण विषय यह रहा कि बदलते बिहार में नए राजनीतिक प्रयोगों के प्रति उत्सुकता तो दिखी  लेकिन वह विश्वास में नहीं बदल सकी। इसे बिहार के मतदाता की दूर दृष्टि कहें या नीतीश-मोदी की जोड़ी पर उसका अटूट विश्वास कि  दिल्ली में ‘आप’  की उल्लेखनीय सफलता के विपरीत, जन सुराज जैसे नवप्रयोग बिहार में अपना खाता तक खोलने में विफल रहे। कांग्रेस 6 सीटों पर सिमट गई और तेजस्वी अपनी सीट बचाने के लिए संघर्ष करते नजर आए। बिहार के मतदाता ने सब सुना, परखा, समझा पर अंत में उसी नेतृत्व पर भरोसा किया जो उन्हें स्थिरता और स्पष्टता के साथ बिहार को कानून व्यवस्था एवं प्रगति की राह पर ले जाता दिखाई दिया।

स्पष्ट है कि बिहार का मतदाता अब सपनों से नहीं, सबूतों से प्रभावित होता है। वो खोखले वादों या सिद्धांतहीन बयानबाजी की राजनीति से तंग आ चुका है। यही कारण रहा कि ‘वोट चोरी’ जैसे आरोप भी जनता के बीच मुद्दा ही नहीं बन सके। मतदान का प्रतिशत बताता है कि लोगों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास पहले से कहीं मजबूत दिखा और वास्तविक संघर्ष बूथ प्रबंधन तथा जमीनी संगठन क्षमता का रहा। जिसने बूथ संभाला, उसने चुनाव संभाला। एन.डी.ए. इस मैदान में निर्णायक रूप से आगे रहा। निश्चित रूप से मोदी फैक्टर इस चुनाव में हमेशा की तरह मजबूत रहा। देश के जनमानस में यह भावना दृढ़ हो रही है कि विकास, स्थिरता और वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए नरेंद्र मोदी का नेतृत्व विश्वसनीय है।

बिहार के मतपत्रों में भी इसी विश्वास की प्रतिध्वनि महसूस की गई। राज्य की स्थिरता और केंद्र की विश्वसनीयता, दोनों ने मिलकर इस जनादेश को आकार दिया। कांग्रेस का एक सीट पर सिमटना और तेजस्वी यादव का अपनी ही सीट पर संघर्ष करना, यह दृश्य सिर्फ  राजनीतिक हार नहीं, एक बड़ा मनोवैज्ञानिक संकेत है कि लालू यादव की विरासत भावनात्मक तो है, पर अब निर्णायक नहीं। तेजस्वी की युवा ऊर्जा सीमित दायरे में रह गई और राहुल गांधी की अपील बिहार की जमीन में जड़ें नहीं जमा सकी। एन.डी.ए. की आंधी के सामने कोई भी टिक नहीं पाया। न नैरेटिव में, न संगठन में, न ही नेतृत्व में। क्योंकि अतीत की स्मृतियां अब भी बिहार के मन में जीवित हैं। ‘जंगल राज’ शब्द सिर्फ  राजनीतिक आरोप नहीं बल्कि कई परिवारों के लिए वास्तविक पीड़ा रहा है।

इसी कारण सुरक्षा, स्थिरता और शासन की निरंतरता इस बार प्रमुख मुद्दों के रूप में उभरे। इन नतीजों से जनता ने स्पष्ट कर दिया है कि उसे अनिश्चितता नहीं, व्यवस्था चाहिए। उसे अतीत नहीं, भविष्य चाहिए। युवा मतदाता भी इस चुनाव का मूक परिवर्तनकारी चेहरा रहा। उन्हें  शिक्षा, कौशल, नौकरी और ऐसा राज्य चाहिए जहां से पलायन नहीं, रहने में गर्व हो। प्रवास की मजबूरियों के बीच भी, घरों में महिलाओं और युवाओं ने जिस गंभीरता से मतदान किया, उसने परिणाम की दिशा बदल दी। अंतत: इस जनादेश की सबसे बड़ी जीत किसी दल या नेता की नहीं बल्कि बिहार के जागे हुए मतदाता की है। उसने दिखा दिया कि वह अब सोचकर, समझकर, तौलकर वोट देता है। वह किसी भ्रम में नहीं आता और किसी स्थायी नारे के पीछे नहीं चलता। बिहार ने अपना निर्णय दे दिया है। गहरा, स्पष्ट और संयत। अब बिहार इंतजार नहीं करता, बिहार अपेक्षा करता है। और यही अपेक्षा लोकतंत्र की सबसे सुंदर, सबसे सशक्त ध्वनि है।-डा. नीलम महेंद्र
 

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