बारिश के पानी को सहेजने की खोखली योजनाएं

Edited By ,Updated: 29 Jun, 2022 05:00 AM

hollow plans to save rain water

यूं तो समूची पृथ्वी पर 97 प्रतिशत पानी है, लेकिन 3 प्रतिशत ही उपयोग के लायक है। उसमें भी 2.4 प्रतिशत ग्लेशियरों और उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में जमा हुआ है और केवल 0.6 प्रतिशत पानी बचता

यूं तो समूची पृथ्वी पर 97 प्रतिशत पानी है, लेकिन 3 प्रतिशत ही उपयोग के लायक है। उसमें भी 2.4 प्रतिशत ग्लेशियरों और उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में जमा हुआ है और केवल 0.6 प्रतिशत पानी बचता है जो नदियों, झीलों, तालाबों और कुंओं में है, जिसें हम उपयोग करते हैं। यकीनन आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है लेकिन हकीकत यही है। कुछ वर्ष पूर्व नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में एक याचिका दाखिल हुई थी, जिसके आंकड़े बेहद सचेत करते हैं। इसमें कहा गया था कि भारत में रोजाना 4,84,20,000 क्यूबिक मीटर से ज्यादा पेयजल बर्बाद होता है। 

लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में 2 वर्ष पूर्व पता चला था कि 23 प्रतिशत ग्रामीण आबादी, जो 21 करोड़ के लगभग है, को पीने के लिए जहां साफ पानी तक उपलब्ध नहीं है। वहीं सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 71 करोड़ ग्रामीणों को रोजाना 40 लीटर, तो 18 करोड़ को उससे भी कम पानी मिल पाता है। भारत में स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद यह स्थिति बेहद चिंतनीय है। लेकिन अढ़ाई बरस बाद, यानी 2025 तक हमारी पानी की मांग 40 बिलियन क्यूबिक मीटर से बढ़ कर जब 220 बिलियन क्यूबिक मीटर होगी तब चिन्ता और भी ज्यादा होगी। 

आंकड़े बताते हैं कि अभी दुनिया में करीब पौने 2 अरब लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिलता। संयुक्त राष्ट्र की मौसम विज्ञान एजैंसी (डब्ल्यू.एम.ओ.) की ‘द स्टेट ऑफ क्लाइमेट सॢवसेज 2021 वॉटर’ नाम की नई रिपोर्ट बताती है कि जहां 2018 में दुनिया भर में 3.6 अरब लोगों को पूरे साल में करीब एक से 2 महीने पानी की जबरदस्त कमी थी। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो 2050 तक 5 अरब लोग कमी से जूझेंगे। सबको पता है कि 0.05  प्रतिशत पानी ही उपयोगी और ताजा है। जबकि अभी दुनिया की आबादी करीब 7.9 अरब है। 

धरती के बढ़ते तापमान के चलते भी पानी की उपलब्धता में बदलाव स्वाभाविक है। कभी लगता है कि मानसून जल्दी आ गया, कभी लगता है कि आकर भटक गया। कभी बादल उमड़-घुमड़ कर भी बिना बरसे निकल जाते हैं। कभी बरसते हैं तो ऐसा कि शहर के शहर पानी-पानी हो जाते हैं। कुल मिलाकर एक अनिश्चितता बनी रहती है। महज 20-25 साल पहले की स्थिति को याद करें तो ऐसा नहीं था। यह बेहद खतरनाक स्थिति है। बावजूद इसके हम गंभीर नहीं हैं, न बारिश के पानी को सहेजने और न प्रकृति के साथ बेरहमी को लेकर। 

आंकड़े, नतीजे और कोशिशें बताती हैं कि 20-21 बरस पहले मध्य प्रदेश के उज्जैन का बलोदा लाखा गांव में किसानों द्वारा खेतों में बनाए गए छोटे-छोटे तालाब और सूखे कुओं का पुनर्भरण,  महाराष्ट्र में वनराई नामक गैर-सरकारी संगठन के द्वारा रेत की बोरियों से बनाए गए बंधार, 1964 में पुणे के पास पंचगनी में मोरल रिआर्मामैंट सैंटर बनाते समय नक्शे में बारिश के पानी को सहेजने की डिजाइन और 3 अलग व सफल तालाब बनाना, जिनके पानी का पूरे साल इस्तेमाल किए जाने जैसे कई उदाहरण हैं। यह जलसंचय के अलावा कई नैतिक बातें भी सिखलाते हैं। कर्नाटक स्थित बायफ  डिवैल्पमैंट रिसर्च फाऊंडेशन ने एक अनोखा मॉडल विकसित किया, जिसे खेत-तालाब नैटवर्क के नाम से जाना जाता है और वर्षा जल संग्रहण करता है। 

अब जबकि तेजी से औद्योगिकीकरण हुआ,  न जाने कितने लाख हैक्टेयर में जंगल साफ हुए और करोड़ों पेड़ कट गए, बड़े-बड़े स्थानीय पहाड़ या टीले गिट्टी की खातिर विस्फोट या बड़ी-बड़ी मशीनों से समतल कर दिए गए। कंक्रीट के जंगल, नदियों का सीना छलनी कर निकाली गई रेत से सूखी नदियां, हर गांव से लेकर महानगरों तक असंख्य बोरवैलों ने धरती की कोख रात-दिन चूसकर सूखी कर दी और हम हैं कि बारिश के पानी को सहेज कर वापस धरती की लौटाने के लिए सिवाय औपचारिकता पूरी करने के ङ्क्षचतातुर नहीं दिखते! 

लगता नहीं कि यह उसी धरती, जिसे सभी ने मां का दर्जा दे रखा है, के साथ अन्याय है, बहुत बड़ा अधम पाप है, जिसे हम जानते तो हैं लेकिन मानते नहीं। वह भी यह जानकर कि जल ही जीवन है और जल है तो कल है। माना कि बारिश का चक्र बेतरतीब हुआ है लेकिन क्या कभी जाना कि क्यों? फिर भी, क्या यह जरूरी नहीं कि विपरीत परिस्थितियों में भी जितनी बारिश हो रही है, उसे ही सहेजने की खातिर गंभीर हुआ जाए, ताकि धरती की सूखी कोख को संजीवनी मिल जाए!

वर्षाजल को सहेजने के लिए कागजों में तो हमारे पास बड़ी-बड़ी योजनाएं हैं। रेन वाटर हार्वेस्टिंग के एक से एक मॉडल हैं। घर की छत हो या शहर, कस्बे की सड़कें या फिर खेतों की मेड़ या समतल मैदान, हर जगह मामूली से खर्चे पर बरसाती पानी को वापस धरती में, घर के कुएं या बोरवैल, बावड़ी या तालाब में पहुंचाने के तमाम आसान डिजाइन हैं। लेकिन सवाल वही कि इसे लेकर लोग, जनप्रतिनिधि, स्थानीय प्रशासन, सरकारें और ब्यूरोक्रेट्स कहां संजीदा हैं। 

लगता नहीं कि जिस तरह साफ-सफाई, खुले में शौच रोकने, देश भर में सड़कों का नैटवर्क, हर गांव को मुख्य सड़क से जोडऩे की मुहिम, स्मार्ट सिटी, स्मार्ट क्लास, डिजिटलीकरण की अनिवार्यता यानी हमारे जीवन को सुलभ, आसान बना जरूरतें पूरी करने की कवायदें दिखती हैं, लेकिन पानी के सहेजने को लेकर यही गंभीरता क्यों नहीं? वर्षा जल संग्रहण प्रत्येक घर, दफ्तर, प्रतिष्ठानों, खेत, कुआं, तालाब, बावडिय़ों के लिए न केवल अनिवार्य हो, बल्कि हर साल और खासकर बारिश के दौरान इस बात का नियमित ऑडिट भी हो कि कहां-कहां कितना जल संचय हो सका। इसके लिए उन्नत तकनीकें विकसित की जाएं, जो अब बेहद आसान है। 

ड्रोन, सैटेलाइट मैपिंग, सर्वेक्षण से जानकारी संकलित की जाए कि हर उस जगह से, जहां पूरे साल जल का दोहन किया जाता है, बारिश का कितना पानी उस स्रोत को वापस लौटाया गया। इसके लिए चाहे पी.पी.पी. मॉडल विकसित हो या कानून की आजमाइश अथवा डंडा इस्तेमाल किया जाए। हां, भावी पीढ़ी के सुरक्षित जीवन के लिए बिना देर किए यह करना ही होगा, वरना इतनी देर हो चुकी होगी कि हिरोशिमा और नागासाकी से भी बड़ी त्रासदी जैसा कुछ हो जाए तो हैरानी नहीं होगी।-ऋतुपर्ण दवे

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