इतिहास मोदी सरकार को किस नजर से देखेगा?

Edited By Updated: 08 Oct, 2026 02:47 AM

how will history view the modi government

जब नरेंद्र मोदी 2001 में गुजरात विधानसभा हॉल में राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में दाखिल हुए, तो यह पहली बार था जब वह बिना कभी विधायक चुने गए विधानसभा में प्रवेश कर रहे थे। 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में संसद में उनका प्रवेश भी सदन में उनकी पहली...

जब नरेंद्र मोदी 2001 में गुजरात विधानसभा हॉल में राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में दाखिल हुए, तो यह पहली बार था जब वह बिना कभी विधायक चुने गए विधानसभा में प्रवेश कर रहे थे। 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में संसद में उनका प्रवेश भी सदन में उनकी पहली उपस्थिति थी क्योंकि वह कभी सांसद नहीं रहे थे। तब से गंगा में बहुत पानी बह चुका है जब उन्होंने बिना किसी रुकावट के 25 वर्षों तक सरकारों का नेतृत्व करने की अपनी अभूतपूर्व यात्रा शुरू की थी। इस कॉलम की सीमाओं के भीतर सरकारों के मुखिया के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान की सफलताओं और विफलताओं को संक्षेप में बताना भी संभव नहीं होगा। हालांकि, एक अनुमान लगाने का प्रयास किया जा सकता है कि पद छोडऩे के बाद वह किस तरह की विरासत छोड़ेंगे। निश्चित रूप से, इस तरह के किसी भी निष्पक्ष विश्लेषण के आलोचक जरूर होंगे जो व्यक्त किए गए विचारों से सहमत न हों।

सबसे पहले उन सकारात्मक पहलों की बात जो पहले गुजरात और फिर उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद बाकी देश को प्रभावित कर चुकी हैं। यह लेखक उस समय का साक्षी है जब मोदी मुख्यमंत्री के कार्यालय में आए थे। राज्य में प्रगति की गति धीमी थी और अहमदाबाद और वड़ोदरा के बीच राजमार्ग और बंदरगाहों के विकास तथा राज्य के कुछ हिस्सों में औद्योगिक विकास को छोड़कर, इसकी अर्थव्यवस्था सुस्त थी। एक चौथाई सदी बाद, गुजरात कई मायनों में बदल गया है। बुनियादी ढांचे, उद्योग और आर्थिक विकास सहित विकास की गति अभूतपूर्व रही है। साबरमती नदी, जो मेरे वहां तैनात रहने के दौरान एक मैली, सूखी मौसमी नदी में बदल गई थी, अब उसमें साल भर पानी रहता है और एक शानदार रिवरफ्रंट है। राजमार्गों, बंदरगाहों, आवास, सार्वजनिक सुविधाओं और अन्य बुनियादी ढांचे में बड़ा बदलाव आया है। वाइब्रेंट गुजरात निवेश शिखर सम्मेलनों, ई.गवर्नेंस पहलों और एक आधुनिक, निवेश के अनुकूल गुजरात की नींव रखने में उनकी भूमिका को स्वीकार करने की आवश्यकता है।

मोदी ने ‘गुजरात मॉडल’ को राष्ट्रीय राजधानी में लाने की कोशिश की, हालांकि उनके आलोचक इसे सुनने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने और उनके नेतृत्व वाली सरकार ने कई नई योजनाएं शुरू कीं। इनमें स्वच्छ भारत मिशन, डिजिटल इंडिया मिशन, आयुष्मान भारत और आधार से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार और प्रमुख बुनियादी ढांचे का उन्नयन शामिल है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे उनके नारों ने लोगों को प्रभावित किया, हालांकि योजनाओं के कार्यान्वयन में अभी भी बहुत सुधार की गुंजाइश है।  उनका पहला  कार्यकाल,  स्पष्ट जनादेश के साथ, देश की अर्थव्यवस्था और शासन को बदलने के उद्देश्य से शुरू की गई योजनाओं द्वारा चिह्नित था,  जिसमें विवादास्पद विमुद्रीकरण (नोट बंदी) और देश को एक कर प्रणाली के तहत एकीकृत करने के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जी.एस.टी.) का रोल आऊट शामिल था।

उनके दूसरे कार्यकाल में, और भी बड़े जनादेश के साथ, अनुच्छेद 370 को निरस्त करके जम्मू और कश्मीर को भारत के संवैधानिक ढांचे में एकीकृत किया गया। इसने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.) के पारित होने, कोविड 19 के प्रति प्रतिक्रिया और प्रमुख बुनियादी ढांचे के उन्नयन को भी देखा। उनका तीसरा कार्यकाल, जिसमें भाजपा ने लोकसभा में बहुमत खो दिया है और परिणामस्वरूप गठबंधन सरकार बनी है,  ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ योजना, वक्फ  संशोधन कानून और जाति जनगणना की दिशा में कदम पर सक्रिय विचार के साथ प्रगति पर है। विमुद्रीकरण और जी.एस.टी. रोल आऊट के कारण आए झटकों के बाद देश की अर्थव्यवस्था ने गति पकड़ी है और घरेलू उद्योग को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा रहा है।

और अब सिक्के का दूसरा पहलू। स्वच्छ भारत और बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ जैसे कुछ नारे और योजनाएं काफी हद तक कागजों पर ही रह गई हैं। स्वच्छ गंगा योजना जैसे अभियानों में प्रगति धीमी रही है, जबकि आत्मनिर्भर योजनाओं में ठोस परिणाम हासिल करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जी.एस.टी. व्यवस्था के जल्दबाजी में रोल-आऊट ने  छोटे और मध्यम उद्यमों को प्रभावित किया और अर्थव्यवस्था पर ब्रेक लगा दिया। बाद में कुछ सुधार लाए गए हैं और कुछ पर विचार किया जा रहा है, लेकिन इस अत्यंत आवश्यक सुधार के लिए बेहतर योजना और कार्यान्वयन की आवश्यकता थी। लेकिन वर्तमान सरकार का सबसे बड़ा दाग उसकी विभाजनकारी राजनीति पर रहेगा। हिंदू-मुस्लिम विभाजन के प्रयास स्पष्ट रहे हैं और इन्हें छिपाने का कोई प्रयास भी नहीं किया गया। योगी आदित्यनाथ, हेमंत बिस्वा सरमा और सुवेंदु अधिकारी जैसे कुछ भाजपा मुख्यमंत्रियों ने समुदाय के प्रति तिरस्कार और अवमानना व्यक्त करने में सारी हदें पार कर दी हैं। उन्हें स्पष्ट रूप से केंद्रीय नेतृत्व का समर्थन मिल रहा है। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय राजनीति में कड़वाहट और गहरा विभाजन पैदा हुआ है। हिंदू-मुस्लिम विभाजन के इस प्रयास ने पूरे समाज को विभाजित कर दिया है। यह 2002 के गुजरात दंगों की याद भी दिलाता है, जिसमें अदालतें भले ही तत्कालीन सरकार को बरी कर चुकी हों,  लेकिन जनधारणा स्पष्ट रूप से विभाजित है।

मोदी सरकार द्वारा विभिन्न संस्थानों को दिया गया एक और गहरा झटका है। लगभग सभी संवैधानिक पदों पर पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों को बिठाया गया है। चाहे वह राज्यपालों, चुनाव आयुक्तों, उपकुलपतियों या अध्यक्षों के पद हों या  महत्वपूर्ण सरकारी निकाय, एकमात्र योग्यता आर.एस.एस. के साथ घनिष्ठ संबंध दिखाई देती है। योग्यता अब कोई योग्यता नहीं रही। देश अभी भी बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और ग्रामीण विकास के मानकों को प्राप्त करने से बहुत दूर है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि इतिहास उनके प्रति अधिक दयालु होगा। ऐसा लगता है कि वह होगा। वर्तमान सरकार के प्रदर्शन का विश्लेषण इतिहास किस तरह करेगा, यह देखना अभी बाकी है।-विपिन पब्बी
 

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