भारत का भविष्य-निर्माण : मांग, रोजगार के अवसर और आत्मनिर्भरता

Edited By Updated: 23 Jan, 2026 05:08 AM

india s future development demand employment opportunities and self reliance

प्रत्येक भारतीय वस्त्र उत्पाद में कपड़े से कहीं आगे की कहानी छिपी होती है, यह कहानी साहस, आत्मविश्वास और शांत परिवर्तन से जुड़ी है। यह प्रतिङ्क्षबबित करती है कि कैसे एक महिला गरिमा के साथ कार्यबल में प्रवेश करती है, कैसे एक परिवार निरंतर आय के...

प्रत्येक भारतीय वस्त्र उत्पाद में कपड़े से कहीं आगे की कहानी छिपी होती है, यह कहानी साहस, आत्मविश्वास और शांत परिवर्तन से जुड़ी है। यह प्रतिङ्क्षबबित करती है कि कैसे एक महिला गरिमा के साथ कार्यबल में प्रवेश करती है, कैसे एक परिवार निरंतर आय के माध्यम से स्थिरता पाता है और किस प्रकार प्रथम-पीढ़ी का उद्यमी, कौशल को आत्मनिर्भरता में बदल देता है। पिछले 11 वर्षों में, माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्णायक और दूरदर्शी नेतृत्व में, भारत का वस्त्र क्षेत्र एक पारंपरिक उद्योग से एक शक्तिशाली, रोजगार सृजक और जन-केंद्रित वृद्धि इंजन में बदल गया है, जो आत्मनिर्भर भारत की सच्ची भावना को दर्शाता है।

मांग, पैमाना और निर्यात - वृद्धि की आधारशिला : भारत के वस्त्र उद्योग के पुनरुत्थान का आधार मजबूत घरेलू मांग और बढ़ते उपभोग में निहित है। 140 करोड़ से अधिक की आबादी के साथ, भारत दुनिया के सबसे सुदृढ़ वस्त्र बाजारों में से एक है। इस परिवर्तन का पैमाना आंकड़ों से स्पष्ट होता है। भारत का घरेलू वस्त्र बाजार केवल 5 वर्षों में लगभग 8.4 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर अनुमानित 13 लाख करोड़ रुपए हो गया।  पिछले दशक में प्रति व्यक्ति वस्त्र उपभोग लगभग दोगुना हो गया है, जो 2014-15 के लगभग 3,000 रुपए से बढ़कर 2024-25 में 6,000 रुपए से अधिक हो गया और 2030 तक फिर इसके दोगुनी वृद्धि के साथ 12,000 रुपए होने का अनुमान है। इस मांग-आधारित विस्तार का प्रतिबिंब निर्यात में दिखाई पड़ता है। वस्त्र और परिधान का निर्यात 2019-20 के 2.49 लाख करोड़ रुपए, जिस वर्ष कोविड की आपदा आई थी, से बढ़कर 2024-25 में लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपए हो गया। इस प्रकार कोविड के बाद के दौर में लगभग 28 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। 

वस्त्र उद्योग भारत के कार्यबल पुनरुद्धार को सक्षम बना रहा है : वस्त्र उद्योग भारत की रोजगार अर्थव्यवस्था का प्रमुख घटक है। आज, यह क्षेत्र कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार-प्रदाता है, जो 2023-24 के अंत तक लगभग 5.6 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष रूप से समर्थन दे रहा है। कार्यबल की यह संख्या 2014 की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है। कोविड के बाद का चरण विशेष रूप से परिवर्तनकारी रहा है- 2020 से निर्यात-केंद्रित विकास से केवल संगठित क्षेत्र में ही अनुमानित 1.5 करोड़ नई नौकरियों का सृजन हुआ है। 

क्षमता सृजन और सिलाई मशीन का प्रभाव : इस निर्यात सुदृढ़ता के पीछे एक निर्णायक बदलाव छिपा है, जो क्षमता-आधारित वृद्धि की दिशा में किया गया है। पिछले दशक में वस्त्र क्षेत्र का विस्तार एक अनजानी नायिका, सिलाई मशीन, की शक्ति से संभव हुआ। एक उपकरण से आगे बढ़ कर सिलाई मशीन वृद्धि के लिए एक उत्प्रेरक बन गई है, इससे यह बात साबित होती है कि कभी-कभी रोजगार और औद्योगिक स्तर पर सबसे बड़े परिवर्तन सबसे छोटी मशीनों से शुरू होते हैं। केवल कोविड के बाद ही, 1.8 करोड़ से अधिक सिलाई मशीनें भारत के उत्पादन इकोसिस्टम के लिए आयात की गई हैं। 2024-25 में, आयात 61 लाख मशीनों के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे अधिक है। प्रत्येक मशीन वस्त्र-से-परिधान मूल्य शृंखला में लगभग 1.7 श्रमिकों के रोजगार का समर्थन करती है। परिणामस्वरूप, महामारी के बाद सिलाई मशीन के आयात में वृद्धि से वस्त्र क्षेत्र में 3 करोड़ से अधिक नौकरियों का सृजन हुआ है, इस प्रकार क्षमता विस्तार को बड़े पैमाने पर रोजगार वृद्धि के साथ मजबूती से जोड़ा गया है।

महत्वपूर्ण यह है कि रोजगार सृजन केवल आधुनिक कारखानों तक सीमित नहीं रहता। जब इकाइयां उन्नत होती हैं, तो पुरानी मशीनें ग्रे मार्कीट में चली जाती हैं और छोटे उद्यमों, सिलाई इकाइयों और घरेलू व्यवसायों द्वारा इनका पुन: उपयोग किया जाता है, जिससे जमीनी स्तर पर रोजगार का विस्तार होता है। इस विकेंद्रीकृत विस्तार के केंद्र में महिलाएं, ग्रामीण युवा और पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं। विशेष रूप से असंगठित खंड में इस रोजगार के पूरे पैमाने की पहचान करने और समझने के लिए, सरकार जिला नेतृत्व में वस्त्र रूपांतरण (डी.एल.टी.टी.) पहल को आगे बढ़ा रही है, जो यह सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखता है कि रोजगार वृद्धि केवल संख्या में बड़ी न हो, बल्कि कौशल, सामाजिक सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता द्वारा समर्थित भी हो।

कारखानों से कारीगरों तक- सभी के लिए रोजगार: 2030 के लिए हमारा विजन स्पष्ट है- वस्त्र उद्योग को भारत में रोजगार सृजन और समावेशी विकास के सबसे मजबूत इंजनों में से एक के रूप में स्थापित करना। फास्ट फैशन एक शक्तिशाली नए संचालक के रूप में उभर रहा है। आज 20 अरब डॉलर के मूल्य वाले वैश्विक फास्ट फैशन बाजार की 2030 तक 60 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके लिए चुस्त निर्माण और तेज उत्पादन की मांग भारत को अनुकूल स्थिति प्रदान करती है और इससे अगले 4 वर्षों में रोजगार के लगभग 40 लाख अतिरिक्त अवसरों के सृजन की उम्मीद है।

पी.एम. मित्र पार्क में अकेले 20 लाख से अधिक रोजगार सृजन की क्षमता है, जबकि पी.एल.आई. योजना नए कारखानों और नए निवेशों के माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के 3 लाख से अधिक अवसर पैदा करने के लिए तैयार है। व्यापक वस्त्र मूल्य शृंखला आजीविका के लगभग 50 लाख अतिरिक्त अवसरों का सृजन करेगी। नए मुक्त व्यापार समझौते वस्त्र निर्यात और रोजगार बढ़ा रहे हैं और आने वाले भारत-ई.यू. एफ.टी.ए. से नए बाजार खुलेंगे, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और रोजगार का अगला प्रवाह पैदा होगा।

औद्योगिक विकास के साथ-साथ, भारत का हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र सतत रोजगार का आधार बना हुआ है। 65 लाख से अधिक कारीगरों और बुनकरों का समर्थन करने वाला यह क्षेत्र पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार उत्पादों की वैश्विक मांग के साथ स्वाभाविक रूप से अनुकूल है। निर्यात वर्तमान में लगभग 50,000 करोड़ रुपए है और 2032 तक इसे दुगना करके 1 लाख करोड़ रुपए करने का स्पष्ट लक्ष्य है। विशिष्ट योजनाओं और बाजार तक आसान पहुंच से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से, 2030 तक कार्यबल में लगभग 20 लाख अतिरिक्त कारीगरों और बुनकरों के शामिल होने की उम्मीद है। कोविड के बाद, 2020 से 2030 के दशक में भारतीय वस्त्र उद्योग के रूपांतरित होने की संभावना है और इस क्षेत्र से संगठित और असंगठित क्षेत्रों में 5 करोड़ से अधिक नए रोजगार पैदा होने की उम्मीद है। जैसे-जैसे भारत विकसित भारत 2047 की ओर आगे बढ़ रहा है, वस्त्र उद्योग आत्मनिर्भर, वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाता रहेगा, जहां आधुनिक उत्पादन क्षमता, कुशल श्रमिक और सुदृढ़ मांग साथ मिलकर गरिमा के साथ विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगे।-गिरिराज सिंह (वस्त्र मंत्री, भारत सरकार)

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