Edited By ,Updated: 21 Apr, 2022 04:47 AM

दरअसल महंगाई वह सार्वभौमिक सत्य है जिसको लेकर शायद ही कभी ऐसा दौर रहा हो कि सरकार कोई भी हो, निशाने पर न आई हो। कभी महंगाई को विकास के पैमाने से जोड़ा जाता है तो कभी
दरअसल महंगाई वह सार्वभौमिक सत्य है जिसको लेकर शायद ही कभी ऐसा दौर रहा हो कि सरकार कोई भी हो, निशाने पर न आई हो। कभी महंगाई को विकास के पैमाने से जोड़ा जाता है तो कभी इसे महामारी या युद्ध के नाम मढ़ दिया जाता है। लेकिन यह भी बड़ी हकीकत है कि कम से कम भारत में महंगाई की मार हमेशा एक तबका विशेष को ही ज्यादा झेलनी पड़ती है। यह बात अलग है कि समय के साथ इसके निशाने पर समाज का अलग-अलग वर्ग आता रहा है। मौजूदा समय में बेशक महंगाई का सबसे बड़ा खामियाजा वह मध्यम वर्ग ही झेल रहा है, जिसके पास सीमित आय से गुजारा करने के सिवाय और कोई चारा नहीं बचा।
इस सच को भी स्वीकारना होगा कि तमाम वायदों, प्रलोभनों और राजनीतिक दांव-पेंच के बीच कभी सस्ता तो कभी मुफ्त का अनाज, कभी गरीबों को मदद पहुंचाने की होड़ में छूटता और पिसता मध्यम वर्ग ही है जो अपनी सीमित आय में तमाम सरकारी औपचारिकताओं को पूरा कर हमेशा पिसता रहा है। अब चाहे बात इन्कम टैक्स की हो या मकान भाड़ा, वाहन का भाड़ा हो या वक्त पर काम पर पहुंचने की दौड़, बच्चों को योग्यता के हिसाब से पढ़ाने या रहन-सहन में खर्च की या फिर इज्जत के साथ परिवार की दो जून की रोटी की कवायद। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित मध्यम वर्ग ही हुआ है।
मौजूदा महंगाई को पहले कोविड की नजर लगी, अभी रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते ग्लोबल इकोनॉमी की दुहाई दी गई। जिंस और वित्तीय बाजारों में जैसे उतार-चढ़ाव दिख रहे हैं, वे ठीक नहीं हैं। अब ज्यादा सतर्कता के साथ वित्तीय कदम उठाए जाने चाहिएं, जिससे भारत में मुद्रास्फीति और वित्तीय स्थिति पर पडऩे वाले प्रतिकूल असर से निपटने में मदद मिल सके। इसी 11 अप्रैल को सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि मार्च-2022 में खुदरा महंगाई दर फरवरी-2022 की तुलना में इतनी बढ़ी कि 16 महीनों के उच्चतम स्तर 6.95 प्रतिशत पर पहुंच गई। फरवरी-2022 में यही दर 6.07 प्रतिशत थी।
इसी महंगाई दर या वृद्धि की तुलना बीते साल के मार्च से करें तो और भी चौंकाने वाला आंकड़ा सामने है। मार्च में खाने-पीने के सामान के दामों में 7.68 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो फरवरी में केवल 5.85 प्रतिशत थी। वहीं यदि इसी फरवरी के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर बदलती दिखने लगती है। पैट्रोल-डीजल के मूल्य में 10-10 रुपए की वृद्धि का असर माल-भाड़े पर भी पड़ा, जो 15 से 20 रुपए तक बढ़ा। इन कारकों और कारणों से खुदरा और थोक दोनों बाजारों में अनाज, फल, दूध और सब्जियों के दाम बढ़े। मार्च महीने में खाने-पीने की वस्तुओं के दामों में 7.68 प्रतिशत की तेजी आई, जबकि यही खुदरा महंगाई दर फरवरी में 5.85 प्रतिशत पर थी।
फरवरी-2022 में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर 13.11 प्रतिशत रही, जो 4 महीनों का उच्चतम स्तर था। वहीं जनवरी-2022 में दर 12.96 प्रतिशत थी, जो मार्च-2022 में 14.55 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि मार्च 2021 में यही थोक आधारित महंगाई दर केवल 7.89 प्रतिशत थी, जिसका दहाई के अंकों तक पहुंचना चिन्ताजनक है।
137 दिनों के अंतराल के बाद भारत में पैट्रोलियम पदार्थों के दामों में इजाफे का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसने कई दिनों तक थमने का नाम नहीं लिया, जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम गिर चुके थे। भारत में पैट्रोल-डीजल के दामों में बीते 22 मार्च से इसी 6 अप्रैल तक कई बार वृद्धि हुई, जो दिवाली के वक्त से नहीं बढ़े थे। वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर शुरू में भारत में नहीं दिखा, क्योंकि 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव थे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 15 मार्च, 2022 से पहले लगातार 3 सप्ताह तक 130 डॉलर प्रति बैरल तक उछला तेल भी टूट कर 100 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। भारत में पैट्रोलियम पदार्थों के दामों में उछाल दुनिया में तेल के दाम गिरने के बाद शुरू हुआ।
इसी तरह एल.पी.जी., पी.एन.जी., सी.एन.जी. के दाम भी बढ़ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में कीमतों में गिरावट जारी है। 3 अप्रैल को इंडियन बास्केट की कीमत गिरकर 97 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई जो मार्च की औसत कीमत से लगभग 13 प्रतिशत सस्ती है। महंगाई का सबसे ज्यादा असर थाली पर पड़ता है। नींबू तक ने दामों में ऐसी ऐतिहासिक छलांग मारी कि नजर उतारने की बजाय खुद नजर खा गया।
यही हाल आसमान छूते सब्जियों के दामों, दूध, फल और अन्य खाद्य सामग्रियों का भी हुआ। लोहे के सरियों की कीमतें जबरदस्त उछलीं। सीमैंट भी प्रति बोरी 15 से 25 रुपए बढ़ गया। ईंट तक के दाम खूब उछाल पर हैं। कुछ समय पहले तक 2 कमरे, एक रसोई, एक बाथरूम यानी औसत 111 गज का जो मकान 10 लाख रुपए में आसानी से बन जाता था, वह अब 12-13 लाख रुपयों से भी ज्यादा हो गया है। इधर आम दवाइयां जैसे बुखार, दर्द निवारक से लेकर एंटीबायोटिक तक की कीमतें भी 10 प्रतिशत तक बढ़ीं, जिससे इलाज कराने वालों का दर्द घटने की बजाय बढ़ा। रोजाना दवाओं के सहारे जिन्दगी की डोर थामे मरीजों को अब एक-एक सांस भारी पड़ रही है।
वैसे तो महंगाई का सब पर असर पड़ता है और पड़ा भी। खाली जेब आम आदमी कैसे जाएगा बाजार? सवाल फिर वही कि महंगाई को काबू में कैसे रखा जाए? जाहिर है महंगाई वह बेलगाम घोड़ा है जिसे रोका तो नहीं जा सकता पर काबू जरूर किया जा सकता है, वरना जीवन और कठिन हो जाएगा।-ऋतुपर्ण दवे