हमारी भावनाएं भी व्यापार का हिस्सा बना दी गई हैं

Edited By Updated: 03 Nov, 2026 04:20 AM

our emotions have also become part of business

परिवार में किसी की मृत्यु हो जाए, दोस्त बिछड़ जाए, लड़की की विदाई हो रही हो, इम्तिहान में अच्छे नम्बर आ गए, सालों बाद बच्चा हुआ, कोई रूठा हुआ सालों बाद मिला, तो सहज ही हमारे आंसू निकल आते हैं। आंसू हमेशा ही दुख का प्रतीक नहीं होते। खुशी में भी आंसू...

परिवार में किसी की मृत्यु हो जाए, दोस्त बिछड़ जाए, लड़की की विदाई हो रही हो, इम्तिहान में अच्छे नम्बर आ गए, सालों बाद बच्चा हुआ, कोई रूठा हुआ सालों बाद मिला, तो सहज ही हमारे आंसू निकल आते हैं। आंसू हमेशा ही दुख का प्रतीक नहीं होते। खुशी में भी आंसू आते हैं। वह गाना तो सुना ही होगा-‘ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं’।

इसी तरह खुशी में, किसी विचित्र चीज, वेशभूषा, किसी के मजाक, कोई कार्टून आदि बातों पर भी हम हंसते हैं। यही हाल गुस्से का है। जो चीज हमें पसंद नहीं आती, किसी ने हमारा नुकसान कर दिया, चोट पहुंचाई, झूठ  बोला, चुगली की, चोरी की, उधार लेकर नहीं लौटाया, तो भी हमें गुस्सा आता है। कभी गुस्से को हम सिर्फ आंखों से प्रकट करते हैं, तो कभी चिल्लाकर, कभी पीट कर, अनदेखा करके,  बोलना छोड़कर। खुशी मनाने के भी हमारे बहुत से तरीके हैं। नई गाड़ी, घर, मोबाइल, गहने, बच्चों का जन्मदिन, विवाह, अच्छे नम्बर, नौकरी, किसी मित्र-परिजन का मिलना, किसी खोई चीज का मिलना, किसी की गम्भीर बीमारी का ठीक हो जाना आदि बातें हमें खुशी का अहसास कराती हैं। 

हमारे जीवन में नौ रसों की बड़ी भूमिका है। समय-समय पर हमें इन बातों का अहसास भी होता है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में इन नवरसों का उल्लेख मिलता है। नाटक से लेकर तमाम कलाओं में ये अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं। लेकिन जीवन की आपाधापी, भागदौड़, नौकरियों में अस्थिरता, हर रोज नौकरी चले जाने की चिंता ने जैसे हमारे इन मनोभावों पर रोक लगा दी है। ऐसा महसूस होता है कि किसी जान-पहचान वाले के सामने अगर रोएंगे, तो हम छोटे हो जाएंगे। हम कमजोर दिखाई देंगे। इसी तरह अपनी सफलता और खुशी को किसी के सामने दिखाएंगे तो लोग जलेंगे, टंगड़ी मारने की कोशिश करेंगे। किसी के सामने अपनी खुशी प्रकट करेंगे, तो हो सकता है लोग समझें कि बढ़ा-चढ़ाकर किसी बात को बताया जा रहा है। 

कहना यह कि हम अपनी किसी भी भावना को दूसरों के सामने प्रकट करने से बचते हैं। यहां तक कि अब किसी परिजन की मृत्यु पर अपने निकट संबंधी ही रोते नहीं दिखते। अपनी भावनाओं को जैसे हमने सिर्फ अपने तक ही समेट लिया है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि रोने के समय रोना, हंसने के समय हंसना, गुस्से की बात पर गुस्सा करने से हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है। हम बहुत सी गम्भीर बीमारियों से बच जाते हैं। लेकिन शायद हम में से अधिकांश, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, डाक्टरों और परंपरा से चली आ रही बहुत सी हीलिंग हैबिट्स पर ध्यान नहीं देते। हमें यह भी मालूम है कि बाजार हमारे इमोशंस को भुनाने में माहिर है। व्यापारियों को पता चल गया है कि अब मनुष्य अपनी भावनाओं को दूसरों के सामने प्रकट नहीं करना चाहता। इसलिए अब तरह-तरह के क्लब्स खुल गए हैं, जैसे कि रोने के लिए क्लब। यहां आइए, बैठिए, जी भरकर रोइए, फीस पहले या बाद में चुकाइए और चले जाइए। इस तरह के क्लब मुम्बई, सूरत, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद आदि स्थानों पर खुले हैं। अन्य शहरों में भी लगातार खुलते जा रहे हैं।

इसी तरह के क्लब्स हंसने के लिए हैं। यहां आइए, खूब हंसिए, हंसते ही रहिए। खूब अच्छा महसूस करिए और पूरे हफ्ते के लिए तरोताजा होकर चले जाइए। ऐसे क्लब्स दिल्ली, मुम्बई, पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु आदि शहरों में हैं। बेंगलुरु को तो लाफ्टर कैपिटल का खिताब भी मिल चुका है। इसी तरह गुस्सा और भड़ास निकालने के क्लब्स भी मौजूद हैं। दिल्ली, एन.सी.आर., बेंगलुरु, मुम्बई आदि शहरों में हैं। यहां गुस्सा प्रकट करने के लिए तरह-तरह के उपकरण दिए  जाते हैं। इन्हें तोड़कर, पीट कर, नष्ट करके अपना गुस्सा प्रकट किया जा सकता है।
इसी तरह अकेले और समूह में दुख प्रकट करने के लिए भी दिल्ली, मुम्बई आदि स्थानों पर क्लब्स हैं। यहां सबके साथ मिलकर दुख प्रकट किया जा सकता है। शेयर किया जा सकता है। इन भावनाओं को प्रकट करने में एक बात सभी जगह दिखाई देती है कि किसी भी जगह मुफ्त में कुछ नहीं है। हमारी भावनाएं भी व्यापार और विनिमय का हिस्सा बना दी गई हैं।

जबकि अपने समाज में सामूहिकता खूब रही है। किसी सुख-दुख से लेकर अन्य बातों तक। अभी वह पीढ़ी मौजूद है, जिसने वे दिन देखे हैं, जब किसी पड़ोसी की बेटी की शादी कुछ दिन बाद है और आज किसी की बेल पर कद्दू लगे हैं, तो एक बड़े पके कद्दू को संभालकर रख लिया जाता था, ताकि वह पड़ोसी की बेटी के विवाह में काम आ सके। कद्दू अगर कटा नहीं है, तो वह अर्से तक खराब नहीं होता। इसी तरह विवाह के अवसर पर घर की चारपाइयां, बिस्तर, बर्तन, फर्नीचर सब दूसरे के घर चले जाते थे। सब मिलजुलकर काम चलाते थे। 
यही हाल किसी गमी के अवसर पर होता था। यही नहीं, खेती-बाड़ी में भी एक-दूसरे के काम आया जाता था। और तो और, घर का छप्पर जब पड़ता था, तो उसे उठवाने के लिए आसपास के लोग बिना बुलाए ही आ जाते थे। आज विकास की अंधी दौड़ में हम सारी अच्छी बातें और सामूहिकता को भूल गए हैं।-क्षमा शर्मा
 

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