पाकिस्तान का बलूचिस्तान समझौता: चीन से दूरी-अमरीका की ओर झुकाव

Edited By Updated: 16 Oct, 2025 04:04 AM

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पाकिस्तान को चीन से दूर करने की अमरीका की कोशिशें, कम से कम अभी के लिए, कामयाब होती दिख रही हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ अपनी हालिया अमरीकी यात्रा और इसी जून में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा आयोजित निजी लंच के दौरान, पाकिस्तानी...

पाकिस्तान को चीन से दूर करने की अमरीका की कोशिशें, कम से कम अभी के लिए, कामयाब होती दिख रही हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ अपनी हालिया अमरीकी यात्रा और इसी जून में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा आयोजित निजी लंच के दौरान, पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने ट्रम्प को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दोपहर के भोजन के दौरान, बिना किसी व्यापक घरेलू परामर्श के, उन्होंने नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रम्प की सिफारिश कर दी। दरअसल, हाइब्रिड शासन अब अमरीका के सामने वही सौदे पेश कर रहा है जो उसने कभी चीन के सामने पेश किए थे।

यह समझौता अमरीका की ओर नए रणनीतिक झुकाव को दर्शाता है। अमरीका को और खुश करने के लिए, पाकिस्तान फिलस्तीन पर अपने ‘सैद्धांतिक’ रुख को त्यागने को राजी हो गया है और ‘अब्राहम समझौते’ का हिस्सा बनने को तैयार है,जिससे इसराईल को मान्यता मिल जाएगी। उसने सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौते पर पहले ही हस्ताक्षर कर दिए हैं ताकि दोनों देश इस मुद्दे पर एकमत हो सकें और सऊदी शाही परिवार को किसी भी घरेलू या अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया से बचाया जा सके। वास्तविकता यह है कि ट्रम्प की गाजा योजना का समर्थन करने से पहले शरीफ ने प्रस्तावित समझौते के विभिन्न प्रावधानों की बारीकियों को भी नहीं समझा था जिनमें से कुछ को फि लिस्तीनी हितों के लिए हानिकारक माना जाता है।

पाकिस्तान में इस प्रस्ताव का समर्थन एक आश्चर्य की बात थी। इसीलिए शरीफ  पर फिलिस्तीनी हितों की कीमत पर अमरीकियों को खुश करने की कोशिश करने का आरोप लगाया जा रहा है। नतीजतन, उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार को संसद में यह कहते हुए अपनी बात से पीछे हटना पड़ा कि न्यूयॉर्क में पहले उन्हें दिखाई गई शांति योजना के कई प्रावधानों में बदलाव किया गया था और शरीफ  के पास उन्हें पढऩे का समय नहीं था। लेकिन अहम सवाल यह है कि मुनीर और शरीफ  अमरीका से इतनी बेताबी से क्यों मिल रहे हैं? असली वजह यह है कि यह हाइब्रिड सरकार अमरीका को अपने साथ चाहती है क्योंकि उसके पास घरेलू वैधता का अभाव है और वह पूर्व प्रधानमंत्री और सबसे लोकप्रिय नेता इमरान खान को हमेशा जेल में रखना चाहती है। शायद मुनीर और शरीफ  ने बलूचिस्तान में अमरीकी कंपनियों को अनुमति देने के घरेलू और क्षेत्रीय परिणामों पर गंभीरता से विचार नहीं किया है। चीन ने अभी तक इन घटनाक्रमों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है  लेकिन अपनी सीमा के इतने करीब अमरीकियों की संभावित मौजूदगी से वह गुस्से से उबल रहा होगा।

यही कारण है कि उसने काबुल के निकट बगराम एयरबेस को वापस लेने के अमरीकी प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह क्षेत्रीय तनाव पैदा करने का प्रयास कर रहा है। चीन के लिए मुद्दा यह है कि चीनी हितों के लिए सुरक्षा स्थिति में सुधार करने की बजाय जैसा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बार-बार मांग की थी, पाकिस्तान इस क्षेत्र में अमरीका को घुसाने का काम कर रहा है। चीन के अलावा, ईरान भी नाराज होगा क्योंकि वह पहले से ही अमरीका के निशाने पर है। हालांकि अफगान तालिबान अमरीका के साथ बातचीत के खिलाफ नहीं हैं लेकिन वे अमरीकियों को काबुल के पास बगराम एयरबेस पर फिर से कब्जा करने की इजाजत देने को तैयार नहीं हैं।

इसलिए, मुनीर और शरीफ जो प्रस्ताव दे रहे हैं, उससे पाकिस्तान का कोई भी पड़ोसी खुश नहीं होगा। पाकिस्तानी सेना को यह समझना चाहिए कि खैबर पख्तूनख्वा में पहले से ही ऐसी ही स्थिति है, जहां तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान प्रांत में हिंसा बढ़ा रहा है। साथ ही, बलूच अलगाववादी अमरीकियों को अपने संसाधनों का दोहन कैसे करने दे सकते हैं जबकि वे इसी वजह से चीनियों को निशाना बना रहे थे? मुनीर और शरीफ एक खतरनाक रास्ते पर हैं और इस क्षेत्र को अस्थिरता की ओर ले जा रहे हैं और शायद अमरीका और चीन के बीच एक छद्म संघर्ष की ओर भी। यह पाकिस्तान और भारत समेत उसके सभी पड़ोसियों के हितों के लिए हानिकारक होगा।-अविनाश मोहनाने

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